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8.12.11

खुद के गिरेबां में भी झांके टीम अन्ना

इसमें कोई दोराय नहीं है कि आर्थिक आपाधापी और भ्रष्ट राजनीति के कारण भ्रष्टाचार के तांडव से त्रस्त देशवासियों की टीम अन्ना के प्रति अगाध आस्था और विश्वास उत्पन्न हुआ है और आम आदमी को उनसे बड़ी उम्मीदें हैं, मगर टीम के कुछ सदस्यों को लेकर उठे विवादों से तनिक चिंता की लकीरें भी खिंच गई हैं। हालांकि कहने को यह बेहद आसान है कि सरकार जवाबी हमले के बतौर टीम अन्ना को बदनाम करने के लिए विवाद उत्पन्न कर रही है, और यह बात आसानी से गले उतर भी रही है, मगर मात्र इतना कह कर टीम अन्ना के लिए बेपरवाह होना नुकसानदेह भी हो सकता है। इसमें महत्वपूर्ण ये नहीं है कि किन्हीं विवादों के कारण टीम अन्ना के सदस्य बदनाम हो रहे हैं, बल्कि ये महत्वपूर्ण है कि विवादों के कारण भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़ा हुआ आंदोलन प्रभावित हो सकता है। आंदोलन के नेता भले ही अन्ना हजारे हों, मगर यह आंदोलन अन्ना का नहीं, बल्कि जनता का है। यह वो जनता है, जिसमें भ्रष्टाचार के खिलाफ गुस्सा है और उसे अन्ना जैसा नेता मिल गया है, इस कारण वह उसके साथ जुड़ गई है।
वस्तुत: जब से टीम अन्ना का आंदोलन तेज हुआ है, उसके अनेक सदस्यों को विवादों में उलझाने की कोशिशें हुई हैं। पुराने मामलों को खोद-खोद कर बाहर निकाला जा रहा है। साफ तौर पर यह बदले की भावना से की गई कार्यवाही प्रतीत होती है। लेकिन इसका ये मतलब भी नहीं है कि टीम अन्ना पर लगे आरोप पूरी तरह से निराधार हैं। जरूर कुछ न कुछ तो बात है ही। अरविंद केजरीवाल के मामले को ही लीजिए। यह सवाल जरूर वाजिब है कि उन पर बकाया की याद कई साल बाद और आंदोलन के वक्त की कैसे आई, मगर यह भी सही है कि केजरीवाल कहीं न कहीं गलत तो थे ही। और यही वजह है कि उन्होंने चाहे अपने मित्रों से ही सही, मगर बकाया चुकाया ही है। इसी प्रकार किरण बेदी पर हो आरोप लगा, वह भी आंदोलन में सक्रिय भागीदारी का प्रतिफल है, मगर उससे भी कहीं न कहीं ये बात तो उठी ही है कि किरण बेदी ने कुछ तो चूक की ही है, वरना उन्हें राशि लौटने की बात क्यों कहनी पड़ती। प्रशांत भूषण का विवाद तो साफ तौर पर आ बैल मुझे मार वाली कहावत चरितार्थ करता है। लोकतंत्र में हर व्यक्ति को अपना विचार रखने की आजादी है, मगर एक ओर जब पूरा देश टीम अन्ना को आदर्श मान कर आंदोलनरत थी, तब प्रशांत भूषण का कश्मीर के बारे में निजी विचार जाहिर करना बेमानी था ही, टीम अन्ना को मुश्किल में डालने वाला था। जाहिर तौर पर आज यदि प्रशांत भूषण को पूरा देश जान रहा है तो उसकी वजह है टीम अन्ना का आंदोलन, ऐसे में टीम अन्ना के प्रमुख प्रतिनिधि का निजी विचार अनावश्यक रूप से पूरी टीम के लिए दिक्कत का कारण बन गया। उससे भी बड़ी बात ये है कि यदि किसी एक सदस्य के कारण आंदोलन पर थोड़ा भी असर पड़ता है, तो यह ठीक नहीं है। अत: बेहतर ये ही होगा भी वे पूरा ध्यान आंदोलन पर ही केन्द्रित करें, उसे भटकाने वालों को कोई मौका न दें।
वस्तुत: टीम अन्ना के सदस्यों को यह सोचना होगा कि आज वे पूरे देश के एक आइडल के रूप में देखे जा रहे हैं, उनका व्यक्तित्व सार्वजनिक है, तो उन्हें अपनी निजी जीवन को भी पूरी तरह से साफ-सुथरा रखना होगा। लोग उनकी बारीक से बारीक बात पर भी नजर रख रहे हैं, अत: उन्हें अपने आचरण में पूरी सावधानी बरतनी होगी। जब उनका एक नार पूरे देश को आंदोलित कर देता है तो उनकी निजी बात भी चर्चा की विषय हो जाती है। टीम के मुखिया अन्ना हजारे को ही लीजिए। हालांकि वे मूल रूप से अभी जनलोकपाल बिल के लिए आंदोलन कर रहे हैं, मगर उनके प्रति विश्वास इतना अधिक है कि देश के हर ज्वलंत मुद्दे पर उनकी राय जानने को पूरा देश आतुर रहता है। तभी तो जैसे ही केन्द्रीय मंत्री शरद पवार को एक युवक ने थप्पड़ मारा तो रालेगणसिद्धी में मौजूद मीडिया ने उनकी प्रतिक्रिया भी जानने की कोशिश की। बेहतर तो ये होता कि वे इस पर टिप्पणी ही नहीं करते और टिप्पणी करना जरूरी ही लग रहा था तो इस घटना का निंदा भर कर देते, मगर अति उत्साह और कदाचित सरकार के प्रति नाराजगी के भाव के कारण उनके मुंह से यकायक ये निकल गया कि बस एक ही थप्पड़। हालांकि तुरंत बाद उन्होंने बयान को सुधारा, मगर चंद दिन बाद ही फिर पलटे और उसे जायज ठहराने की कोशिश करते हुए नए गांधीवाद की रचना करने लगे। उन्हें ख्याल में रखना चाहिए कि आज यदि वे पूज्य हो गए हैं तो उसकी वजह ये है कि उन्होंने गांधीवाद का सहारा लिया। विचारणीय है कि आज जब अन्ना हजारे एक आदर्श पुरुष और प्रकाश पुंज की तरह से देखे जा रहे हैं तो उनकी हर छोटी से छोटी बात को आम आदमी बड़े गौर से सुनता है। ऐसे में उनका एक-एक वाक्य सधा हुआ होना ही चाहिए। देखिए न, चंद लफ्जों ने कैसे अन्ना को परेशानी में डाल दिया। अव्वल तो उन्हें पहले केवल लोकपाल बिल पर ही ध्यान केन्द्रित करना चाहिए। यदि सभी राष्ट्रीय मुद्दों और घटनाओं पर भी अपनी राय थोपने का ठेका लेंगे तो आंदोलन गलत दिशा में भटक सकता है।
बहरहाल, इन सारी बातों के बाद भी जहां तक आंदोलन का सवाल है, वह जिस पवित्र उद्देश्य को लेकर हो रहा है, उसके प्रति जनता पूरी तरह से समर्पित है, मगर टीम अन्ना को अपने व्यक्तिगत आचरण पर पूरा ध्यान रखना चाहिए। इससे विरोधियों को अनावश्यक रूप से हमले करने का मौका मिलता है। आज पूरा देश यही चाहता है कि आंदोलन कामयाब हो, मगर छोटी-छोटी बातों से अगर आंदोलन प्रभावित होता है तो यह जनता के साथ अन्याय ही कहलाएगा, जिसके सामने एक लंबे अरसे बाद आशा की किरण चमक रही है।

15.10.11

...तो ये आपके देशभक्‍त हैं!

...तो भाजपा का मानना है कि चाहे डीआईजी डी जी वंज़ारा हों ....या फिर डिप्टी पुलीस कमिश्नर अभय चुडासामा या फिर अमित शाह खुद ...ये सब देश भक्त हैं जिन्हें सोहराबुद्दीन नाम के आतंकवादी को मारने की सज़ा कांग्रेस दे रही है.

जाहिर है, कि एक शख्स जिसके पास इतनी तादाद में असला ओर गोलियां मिलें वो आंतकवादी ही तो होगा ...हालांकि ये दलील अपने आप में कितनी हास्यास्‍पद है, ये बात क्राईम और आतंकवाद जानने वाले लोग आपको बता देंगे.

मगर मैं सोहराबुद्दीन का महिमामंडन नहीं करना चाहता. अंग्रेजी मे कहावत हैं, '...दोज़ हू लिव बाए द गन डाई बाए द गन,' यानी जो बंदूक और हिंसा से सनी जिंदगी जीते हैं वो वैसी ही मौत मरते हैं. सोहराबुद्दीन एक हिस्ट्रीशीटर था ..एक एक्सटोरशनिस्ट था ..लिहाजा आज नहीं तो कल ...ये उसका हश्र जरूर होता. मगर सवाल ये कि क्या उसको मारने वाले देश भक्त हैं.

गौर कीजिए ....पॉप्‍यूलर बिल्डर्स के प्रमोटर रमन पटेल ने कहा है कि उन्‍होंने अमित शाह के खास अजय पटेल को वसूली के तहत सत्तर लाख रुपए दिए थे. और ये पैसे देने के लिए भाजपा के देशभक्त पुलिस अफसर वंजारा ने धमकाया था. पैसे देने के बाद खुद अमित शाह ने उन्हें कॉल किया था.

वंजारा पर ये पहला इल्जाम नहीं है वसूली का ...इससे पहले भी ये इल्जाम लगते रहे हैं कि वो बाकायदा अमित शाह और खुद अपने स्तर पर लोगों से वसूली करते रहे हैं.

अब गौर कीजिए देश भक्त नम्बर दो ..अभय चुडासामा पर. ..इन्हें भी अमित शाह की शह हासिल थी और ये न सिर्फ एक्सटोर्शन में माहिर थे, बल्कि इन्हें फिक्सर कहा जाता है, और लोगों की पोस्टिग कराने का भी भरपूर तजुर्बा हासिल है इन्हें. यही इल्जाम एसपी दिनेश एमएन पर है जिनपर राज्य के संगमरमर व्यापारियों ने जबरन वसूली का आरोप लगाया है. तो ये वो तमाम महानुभव हैं जिन्होंने सोहराबुद्दीन को जन्नत या जहन्नुम का रास्ता दिखाया और अब ये लोग भाजपा के देशभक्त हैं.

मैं नहीं जानता कि देशभक्त होने का ये कौनसा पैमाना है ...मगर ये बात तय है कि सोहराबुद्दीन की मौत इसलिए नहीं हुई क्योंकि वो देश का दुश्मन या फिर 'एनेमी ऑफ दी स्टेट' था ....बल्कि उसकी मौत के पीछे सिर्फ और सिर्फ पैसा था और कुछ नहीं.

कांग्रेस अपनी आदत से मजबूर है. वो मामले को मुस्लिम रंग देने की कोशिश कर रही है और इस बात में दो राय नहीं कि सीबीआई का अचानक इस मामले में हरकत में आ जाना बिहार की राजनीति से जुड़ा है. यानी इस मामले के दो पहलू साफ हैं. कांग्रेस का शर्मनाक माईनोरिटी कार्ड और भाजपा का हास्यास्‍पद देशभक्ति कार्ड. दोनों ही महान और अब मतदाता को सोचना है कि वो किस पर मोहर लगाए.

मगर माफ कीजिएगा...न ये देशभक्ति और न ही सोहराबुद्दीन का मामला मुसलमान उत्पीड़न से जुड़ा हुआ है. चलिए राजनीति के इस वाहियात खेल में हम सब शरीक हैं ....और ये आगे क्या रंग दिखाएगा ..उसकी भविष्यवाणी करने के लिए भी आपको सियासत का दिग्गज जानकार होने की ज़रूरत भी नहीं है.

(अभिसार शर्मा आज तक न्‍यूज चैनल में डिप्‍टी एडीटर हैं. उपरोक्‍त आलेख इनके निजी विचार हैं.)


...तो ये आपके देशभक्‍त हैं!

...तो भाजपा का मानना है कि चाहे डीआईजी डी जी वंज़ारा हों ....या फिर डिप्टी पुलीस कमिश्नर अभय चुडासामा या फिर अमित शाह खुद ...ये सब देश भक्त हैं जिन्हें सोहराबुद्दीन नाम के आतंकवादी को मारने की सज़ा कांग्रेस दे रही है.

जाहिर है, कि एक शख्स जिसके पास इतनी तादाद में असला ओर गोलियां मिलें वो आंतकवादी ही तो होगा ...हालांकि ये दलील अपने आप में कितनी हास्यास्‍पद है, ये बात क्राईम और आतंकवाद जानने वाले लोग आपको बता देंगे.

मगर मैं सोहराबुद्दीन का महिमामंडन नहीं करना चाहता. अंग्रेजी मे कहावत हैं, '...दोज़ हू लिव बाए द गन डाई बाए द गन,' यानी जो बंदूक और हिंसा से सनी जिंदगी जीते हैं वो वैसी ही मौत मरते हैं. सोहराबुद्दीन एक हिस्ट्रीशीटर था ..एक एक्सटोरशनिस्ट था ..लिहाजा आज नहीं तो कल ...ये उसका हश्र जरूर होता. मगर सवाल ये कि क्या उसको मारने वाले देश भक्त हैं.

गौर कीजिए ....पॉप्‍यूलर बिल्डर्स के प्रमोटर रमन पटेल ने कहा है कि उन्‍होंने अमित शाह के खास अजय पटेल को वसूली के तहत सत्तर लाख रुपए दिए थे. और ये पैसे देने के लिए भाजपा के देशभक्त पुलिस अफसर वंजारा ने धमकाया था. पैसे देने के बाद खुद अमित शाह ने उन्हें कॉल किया था.

वंजारा पर ये पहला इल्जाम नहीं है वसूली का ...इससे पहले भी ये इल्जाम लगते रहे हैं कि वो बाकायदा अमित शाह और खुद अपने स्तर पर लोगों से वसूली करते रहे हैं.

अब गौर कीजिए देश भक्त नम्बर दो ..अभय चुडासामा पर. ..इन्हें भी अमित शाह की शह हासिल थी और ये न सिर्फ एक्सटोर्शन में माहिर थे, बल्कि इन्हें फिक्सर कहा जाता है, और लोगों की पोस्टिग कराने का भी भरपूर तजुर्बा हासिल है इन्हें. यही इल्जाम एसपी दिनेश एमएन पर है जिनपर राज्य के संगमरमर व्यापारियों ने जबरन वसूली का आरोप लगाया है. तो ये वो तमाम महानुभव हैं जिन्होंने सोहराबुद्दीन को जन्नत या जहन्नुम का रास्ता दिखाया और अब ये लोग भाजपा के देशभक्त हैं.

मैं नहीं जानता कि देशभक्त होने का ये कौनसा पैमाना है ...मगर ये बात तय है कि सोहराबुद्दीन की मौत इसलिए नहीं हुई क्योंकि वो देश का दुश्मन या फिर 'एनेमी ऑफ दी स्टेट' था ....बल्कि उसकी मौत के पीछे सिर्फ और सिर्फ पैसा था और कुछ नहीं.

कांग्रेस अपनी आदत से मजबूर है. वो मामले को मुस्लिम रंग देने की कोशिश कर रही है और इस बात में दो राय नहीं कि सीबीआई का अचानक इस मामले में हरकत में आ जाना बिहार की राजनीति से जुड़ा है. यानी इस मामले के दो पहलू साफ हैं. कांग्रेस का शर्मनाक माईनोरिटी कार्ड और भाजपा का हास्यास्‍पद देशभक्ति कार्ड. दोनों ही महान और अब मतदाता को सोचना है कि वो किस पर मोहर लगाए.

मगर माफ कीजिएगा...न ये देशभक्ति और न ही सोहराबुद्दीन का मामला मुसलमान उत्पीड़न से जुड़ा हुआ है. चलिए राजनीति के इस वाहियात खेल में हम सब शरीक हैं ....और ये आगे क्या रंग दिखाएगा ..उसकी भविष्यवाणी करने के लिए भी आपको सियासत का दिग्गज जानकार होने की ज़रूरत भी नहीं है.

(अभिसार शर्मा आज तक न्‍यूज चैनल में डिप्‍टी एडीटर हैं. उपरोक्‍त आलेख इनके निजी विचार हैं.)


14.10.11

माही फ्रेंड अन्ना हजारे!

कहते हैं कि देश में अगर अन्ना का कोई सबसे बड़ा समर्थक है, तो वो है महेंद्र सिंह धोनी. वो उनकी तारीफ़ करते नहीं थकते. दरअसल अन्ना ने बुरे वक्त में धोनी का काफी साथ दिया है. बहुत अहसान है अन्ना का माही पर. अरे-अरे, मेरी बातों को ज़्यादा सीरियसली मत लीजिएगा. अब ये इत्तेफ़ाक ही कुछ ऐसा है कि आजकल हर कोई यही मज़ाक कर रहा है.


ऐसा नहीं है कि ये रिश्ता एकतरफ़ा है. दिमाग पर ज़ोर लगाकर याद कीजिए कि आपको जनलोकपाल बिल और अन्ना के बारे में सबसे पहले कब पता चला? वर्ल्डकप के बाद ना? मैंने विश्वकप के दौरान जितने भी मैच कवर किए, छोटे-छोटे झुंड में लोग 'इंडिया अगेंस्ट करप्‍शन' के प्लेकार्ड्स लिए स्टेडियम के बाहर नारेबाज़ी करते थे. मीडिया से समर्थन की गुहार भी लगाते थे, पर उस वक्त क्रिकेट का खुमार कुछ ऐसा था कि हम चाहकर भी उन्हें कवरेज नहीं दे पाए.

खैर, वर्ल्डकप खत्म हुआ, माही के सिर पर ताज सजा. और फिर 30 साल के विश्वविजेता से ध्यान 74 साल के उस शख्स पर जा टिका, जो देश से भ्रष्टाचार भगाना चाहता था.

क्रिकेट से सशक्त हुए देश के युवा लामबंद हुए, जाग्रत हुए और वहीं से अन्ना और माही का एक अजीब-सा रिश्ता शुरू हुआ. जब क्रिकेट नहीं होता, अन्ना का आंदोलन ज़ोर पकड़ता. और जब क्रिकेट टीम का निराशाजनक प्रदर्शन होता, तो अन्ना की आंधी में सबकुछ छुप जाता.

रामलीला मैदान में लहराते तिरंगे वैसे भी किसी क्रिकेट मैदान की ही याद दिलाते हैं, नहीं तो बाकी जगह राजनीतिक पार्टियों के झंडे ही होते हैं, देशभक्ति नहीं.

माही ने प्रेस कॉन्फ़्रेंस में तो अन्ना पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया, पर भीतर ही भीतर टीम इंडिया में सब अन्ना से प्रभावित हैं. काश, इस मुश्किल दौर में भारतीय क्रिकेट को भी एक अन्ना मिल जाता!


23.8.11

अब जोश जवानी का देखो, कैसी करवट ले डाली है !

अब जोश जवानी का देखो, कैसी करवट ले डाली है !
दिल में इनके चिंगारी है, वो और भडकने वाली है !!
खुद को वह हिंदू न मुस्लिम, सिक्ख ईसाई कहता है!
पूरा भारत एक सूत्र मैं, बंधा दिखाई देता है,
तुम अब या तो खुद को बदलो, या बदलेगा तुम्हे वख्त
तनी हुई है इनकी मुठ्ठी, और इरादे बिलकुल सख्त
वंदे मातरम होठों पर है, देश प्रेम की आंधी है
और साथ मैं इनके देखो, अन्ना जैसा गाँधी है

9.8.11

हमें क्यों चाहिए जन लोकपाल?

हमें क्यों चाहिए जन लोकपाल?

सामान्य सवाल

1. हमें क्यों चाहिए लोकपाल?
2. क्या कहता है जन लोकपाल कानून?
3. लोकपाल और लोकायुक्त का काम

हमें क्यों चाहिए लोकपाल?


मोटे तौर पर, लोकपाल कानून बनवाने के दो मकसद हैं -
पहला मकसद है कि भ्रष्ट लोगों को सज़ा और जेल सुनिश्चित हो। भ्रष्टाचार, चाहे प्रधानमंत्री का हो या न्यायधीश का, सांसद का हो या अफसर का, सबकी जांच निष्पक्ष तरीके से एक साल के अन्दर पूरी हो। और अगर निष्पक्ष जांच में कोई दोषी पाया जाता है तो उस पर मुकदमा चलाकर अधिक से अधिक एक साल में उसे जेल भेजा जाए।


दूसरा मकसद है आम आदमी को रोज़मर्रा के सरकारी कामकाज में रिश्वतखोरी से निजात दिलवाना। क्योंकि यह एक ऐसा भ्रष्टाचार है जिसने गांव में वोटरकार्ड बनवाने से लेकर पासपोर्ट बनवाने तक में लोगों का जीना हराम कर दिया है। इसके चलते ही एक सरकारी कर्मचारी किसी आम आदमी के साथ गुलामों जैसा व्यवहार करता है।

प्रस्तावित जनलोकपाल बिल में इन दोनों उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए सख्त प्रावधान रखे गए हैं। आज किसी भी गली मोहल्ले में आम आदमी से पूछ लीजिए कि उन्हें इन दोनों तरह के भ्रष्टाचार से समाधान चाहिए या नहीं। देश के साथ ज़रा भी संवेदना रखने वाला कोई आदमी मना करेगा? सिवाय उन लोगों के जो व्यवस्था में खामी का फायदा उठा-उठाकर देश को दीमक की तरह खोखला बना रहे हैं।

जन्तर-मन्तर पर अन्ना हज़ारे के साथ लाखों की संख्या में खड़ी हुई जनता यही मांग बार-बार उठा रही थी। देश के कोने कोने से लोगों ने इस आन्दोलन को समर्थन इसलिए नहीं दिया था कि केन्द्र और राज्यों में लालबत्ती की गाड़ियों में सरकारी पैसा फूंकने के लिए कुछ और लोग लाएं जाएं। बल्कि इस सबसे आजिज़ जनता चाहती है कि भ्रष्टाचार का कोई समाधान निकले, रिश्वतखोरी का कोई समाधान निकले। भ्रष्टाचारियों में डर पैदा हो। सबको स्पष्ट हो कि भ्रष्टाचार किया तो अब जेल जाना तय है। रिश्वत मांगी तो नौकरी जाना तय है।

एक अच्छा और सख्त लोकपाल कानून आज देश की ज़रूरत है। लोकपाल कानून शायद देश का पहला ऐसा कानून होगा जो इतने बड़े स्तर पर जन-चर्चा और जन-समर्थन से बन रहा है। जन्तर-मन्तर पर अन्ना हज़ारे के उपवास और उससे खड़े हुए अभियान के चलते लोकपाल कानून बनने से पहले ही लोकप्रिय हो गया है। ऐसा नहीं है कि एक कानून के बनने मात्र से देश में भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा या इसके बाद रामराज आ जाएगा। जिस तरह भ्रष्टाचार के मूल में बहुत से तथ्य काम कर रहे हैं उसी तरह इसके निदान के लिए भी बहुत से कदम उठाने की ज़रूरत होगी और लोकपाल कानून उनमें से एक कदम है।

क्या कहता है जन लोकपाल कानून?


अन्ना हज़ारे साहब ने भ्रष्टाचार के खिलाफ एक सख्त कानून जन लोकपाल बिल पारित कराने के लिए देशभर में एक देशव्यापी आन्दोलन छेड़ा। ये जन लोकपाल कानून आखिर है क्या? आईए इसके बारें में हम थोड़ा और जानें :-

लोकपाल और लोकायुक्त का गठन
केन्द्र के अन्दर एक स्वतन्त्र संस्था का गठन किया जाएगा, जिसका नाम होगा जन लोकपाल। हर राज्य के अन्दर एक स्वतन्त्र संस्था का गठन किया जाएगा, जिसका नाम होगा जन लोकायुक्त। ये संस्थाएं सरकार से बिल्कुल पूरी तरह से स्वतन्त्र होगी। आज जितनी भी भ्रष्टाचार निरोधक संस्थाएं हैं जैसे सीबीआई, सीवीसी, डिपार्टमेण्ट विजिलेंस, स्टेट विजिलेंस डिपार्टमेण्ट, एण्टी करप्शन ब्रांच यह सारी की सारी संस्थाएं पूरी तरह सरकारी शिकंजे के अन्दर हैं। यानि कि उन्हीं लोगों के अन्दर हैं जिन लोगों ने भ्रष्टाचार किया है। यानि की चोर जो है वो ही पुलिस का मालिक बन बैठा है। हमने यह लिखा है कि इस कानून के तहत जन लोकपाल और जन लोकायुक्त यह पूरी तरह से सरकारी शिकंजे से बाहर होगी।

जन लोकपाल का स्वरूप
जन लोकपाल में दस सदस्य होंगे। एक चैयरमेन होगा उसी तरह से हर राज्य के जन लोकायुक्त में दस सदस्य होंगे एक चैयरमेन होगा।

लोकपाल और लोकायुक्त का काम


आम आदमी की शिकायत पर सुनवाई करेगा
जन लोकपाल केन्द्र सरकार के विभागों में हो रहे भ्रष्टाचार के बारे में शिकायतें प्राप्त करेगा और उन पर एक्शन लेगा। जन लोकायुक्त उस राज्य के सरकारी विभागों के बारे भ्रष्टाचार की शिकायतें लेगा और उन पर कार्यवाही करेगा।

तय समय सीमा में जांच पूरी कर दोषी के खिलाफ मुकदमा चलाना
देशभर में पंचायत से लेकर प्रधानमंत्री कार्यालय तक हर जगह हम भ्रष्टाचार देखते हैं। मिड डे मील में भ्रष्टाचार है, नरेगा में भ्रष्टाचार है, राशन में भ्रष्टाचार है, सड़क के बनने में भ्रष्टाचार है, उधर 2जी स्पेक्ट्रम का भ्रष्टाचार, कॉमनवेल्थ खेलों में भ्रष्टाचार है। आदर्श स्केम है, मंत्रियों का भ्रष्टाचार है और गांव में सरपंच का भ्रष्टाचार है।
इस कानून के तहत यह कहा गया है कि कोई भी व्यक्ति अगर लोकपाल में या लोकायुक्त में जाकर शिकायत करता है तो उस शिकायत के ऊपर जांच 6 महीने से 1 साल तक के अन्दर पूरी करनी पड़ेगी। अगर शिकायत की जांच करने के लिये लोकपाल के पास कर्मचारियों की कमी है तो लोकपाल को यह छूट दी गई है कि वह ज्यादा कर्मचारियों को लगा सकता है, लेकिन जांच को उसे एक साल के अन्दर पूरा करना पड़ेगा।

भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ उठाने वालों की सुरक्षा
अगर आज भ्रष्टाचार के खिलाफ शिकायत करते हैं तो आपकी जान को खतरा होता है। लोगों को मार डाला जाता है, उनको तरह-तरह से प्रताड़ित किया जाता है। लोकपाल के पास यह पावर होगी और उसकी यह जिम्मेदारी होगी कि भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ उठाने वालों को संरक्षण देने का काम लोकपाल का होगा।

भ्रष्ट निजी कम्पनियों के खिलाफ कार्रवाई
अगर कोई कम्पनी या कोई बिजनेसमैन सरकार में रिश्वत दे कर कोई नाजायज काम करवाता है, तो आज भ्रष्टाचार निरोधक कानून में ये लिखा है कि जांच ऐजेंसी को ये सबूत इकट्ठा करना पड़ता है, वो ये दिखा सके कि रिश्वत दी गई और रिश्वत ली गई। ये साबित करना बड़ा मुश्किल होता है क्योंकि वहां कोई गवाह मौजूद नहीं होता। इसमें हमने कानून में यह लिखा है अगर कोई बिजनेसमैन या कोई कम्पनी सरकार से कोई भी ऐसा काम करवाती है जो की कानून के खिलाफ है, जो कि गलत है तो ये मान लिया जायेगा कि ये काम रिश्वत दे कर और रिश्वत लेकर किया गया है। इसमें जांच ऐजेंसी को ये साबित करने की जरूरत नहीं होगी कि रिश्वत ली गई या दी गई।

भ्रष्टाचारियों के खिलाफ क्या कार्रवाई करेगा जन लोकपाल?


जांच होने के बाद लोकपाल दो कार्यवाही करेगा -
(01) एक तो ये कि जो भ्रष्ट अपफसर है उसको नौकरी से निकालने की पावर लोकपाल के पास होगी। उनको एक सुनवाई (हियरिंग) देकर, जांच के दौरान जो सबूत और गवाह मिले उनकी सुनवाई करके, लोकपाल दोषी अधिकारी को नौकरी से निकालने का दण्ड देगा या उनके खिलाफ विभागी कार्रवाई का आदेश देगा या कोई और भी पेनल्टी लगा सकता है। जैसे उनकी तरक्की रोकना, उनकी इन्क्रीमेण्ट रोकना आदि। इस तरह की भी पेनल्टी उन पर लगा सकता है।

(02) दूसरी चीज़ जो लोकपाल करेगा वो ये कि जांच के तहत जो सबूत मिले उन सबके आधार पर वह ट्रायल कोर्ट के अन्दर मुकदमा दायर करेगा और इन लोगों को जेल भिजवाने की कार्यवाही शुरू करेगा।

तो कुल मिलाकर दो चीज़े हो गई। एक तो उनको नौकरी से निकालने की कार्यवाही शुरू हो जाएगी। इसका अधिकार लोकपाल को होगा। वह सीधे-सीधे आदेश देगा उन्हें नौकरी से निकालने के लिए और दूसरा ये कि उन्हें जेल भेजने के लिये अदालत में मुकदमा दायर किया जाएगा।

जन लोकपाल कानून बनने के बाद भ्रष्टाचारियों को क्या सजा हो सकती है?


भ्रष्टाचार साबित होने पर एक साल से लेकर उम्र भर के लिए जेल
आज हमारे भ्रष्टाचार निरोधक कानून में भ्रष्टाचार के लिए कम से कम 6 महीने की सज़ा का प्रावधान है और ज्यादा से ज्यादा सात साल की सज़ा का प्रावधान है। जनलोकपाल कानून में यह कहना है कि इसे बढ़ाकर कम से कम एक साल और ज्यादा से उम्र कैद यानि कि पूरी जिन्दगी के कारावास का प्रावधान किया जाना चाहिए।

भ्रष्टाचार से देश को हुए नुकसान की वसूली
आज हमारी पूरी भ्रष्टाचार निरोधक सिस्टम के अन्दर अगर किसी को सज़ा भी होती है, तो ऐसा कहीं भी नहीं लिखा कि उसने जितना पैसा रिश्वत में कमाया या जितना पैसा जितना उसने सरकार को चूना लगाया वो उससे वापस लिया जाएगा। तो जैसे केन्द्र सरकार मे मंत्री रहते हुए ए.राजा ने, ऐसा कहा जा रहा है कि उसने तीन हजार करोड़ रूपयों की रिश्वत ली, दो लाख करोड़ का उसने चूना लगाया। अब अगर ए.राजा को सज़ा भी होती है तो हमारे कानून के तहत उसको अधिकतम सात साल की सज़ा हो सकती है और सात साल बाद वापस आकर वो तीन हजार करोड़ रूपये उसके। हमने इस कानून में ये प्रावधान किया है कि सज़ा सुनाते वक्त ये जज की ज़िम्मेदारी होगी कि जितना उसने सरकारी खज़ाने को चूना लगाया है, यानि उस भ्रष्ट अफसर और भ्रष्ट नेता ने सरकार को जितना चूना लगाया है ये जज की जिम्मेदारी होगी कि वो सारा का सारा पैसा उससे रिकवर करने के लिए, उससे वापस लेने के लिए आदेश किए जाए और उससे रिकवर किए जाए।

जांच के दौरान आरोपी की सम्पत्ति के हस्तान्तरण पर रोक
जांच के दौरान अगर लोकपाल को ये लगता है कि किसी अधिकारी या नेता के खिलाफ सबूत सख्त हैं, तो लोकपाल उनकी सारी सम्पत्ति, उनकी जायदाद की पूरी लिस्ट बनाएगा और उसका नोटिफिकेशन जारी करेगा। नोटिफिकेशन जारी होने के बाद भ्रष्ट व्यक्ति उस सम्पत्ति को ट्रांसफर नहीं कर सकता। यानि न किसी के नाम कर सकता है और न ही बेच सकता है।
नहीं तो कहीं ऐसा न हो कि जैसे ही उसे पता चले तो वह अपनी सारी की सारी सम्पत्ति ट्रांसफर करदे और उसने सरकार को जितना चूना लगाया, उसकी सारी रिकवरी हो न पाए।

नेताओं, अधिकारीयों और जजों की सम्पत्ति की घोषणा
कानून में ये प्रावधान दिया गया है कि हर अफसर को और हर नेता को हर साल के शुरूआत में अपनी अपनी सम्पत्ति का ब्यौरा वेबसाइट पर डालना पड़ेगा और अगर बाद में ऐसी कोई सम्पत्ति मिलती है, जिसका ब्यौरा उन्होंने वेबसाइट पर नहीं डाला, तो यह मान लिया जाएगा कि वो सम्पत्ति उन्होंने भ्रष्टाचार के जरिए हासिल की है और उस सम्पत्ति को जब्त करके उनके खिलाफ भ्रष्टाचार का मुकदमा दायर किया जाएगा।

आम आदमी की शिकायतों का समाधान


हर विभाग में सिटीज़न चार्टर:
एक आम आदमी जब किसी सरकारी दफ्तर में जाता है, उसे राशन कार्ड बनवाना है, उसे पासपोर्ट बनवाना है, उसे विधवा पेंशन लेनी है, उससे रिश्वत मांगी जाती है और अगर वो रिश्वत नहीं देता तो उसका काम नहीं किया जाता। जन लोकपाल बिल के अन्दर ऐसे लोगों को भी सहायता प्रदान करने की बात कही गई है। इस कानून के मुताबिक हर विभाग को एक सिटीज़न्स चार्टर बनाना पडे़गा। उस सिटीज़न्स चार्टर में ये लिखना पड़ेगा कि वो विभाग कौन सा काम कितने दिन में करेगा, कौन ऑफिसर करेगा, जैसे ड्राईविंग लाईसेंस कौन अपफसर बनाएगा, कितने दिन में बनाएगा, राशन कार्ड कौन ऑफिसर बनाएगा, कितने दिन में बनाएगा, विधवा पेंशन कौन ऑफिसर बनाएगा कितने दिनों में बनाएगा...। इसकी लिस्ट हर विभाग को जारी करनी पड़ेगी।

सिटीज़न चार्टर का पालन विभाग के मुखिया की ज़िम्मेदारी
कोई भी नागरिक अगर उसको कोई काम करवाना है तो वो नागरिक उस विभाग में उस अफसर के पास जाएगा अपना काम करवाने के लिए, अगर वो अधिकारी उतने दिनों में काम नहीं करता तो फिर ये नागरिक हैड ऑफ द डिपार्टमेण्ट को शिकायत करेगा हैड ऑफ डिपार्टमेण्ट को जन शिकायत अधिकारी नोटिफाई किया जायेगा। हैड ऑफ डिपार्टमेण्ट का यह काम होगा कि अगले 30 दिन के अन्दर उस काम को कराए।

विभाग का मुखिया काम न करे तो लोकपाल के विजिलेंस अफसर को शिकायत:
विभाग का मुखिया भी अगर काम नहीं कराता तो, नागरिक लोकपाल या लोकायुक्त में जाकर शिकायत कर सकता है। लोकपाल का हर ज़िले के अन्दर एक न एक विजिलेंस अफसर जरूर नियुक्त होगा, लोकायुक्त का हर ब्लॉक के अन्दर एक न एक विजिलेंस अफसर जरूर नियुक्त होगा। नागरिक अपने इलाके के विजिलेंस अफसर के पास जा कर शिकायत करेगा, विजिलेंस अफसर के पास जब शिकायत जायेगी तो यह मान लिया जायेगा कि यह हैड ऑफ डिपार्टमेण्ट ने और उस ऑफिसर ने भ्रष्टाचार की उम्मीद में, रिश्वतखोरी की उम्मीद में यह काम नहीं किया। ये मान लिया जाएगा।

लोकपाल के विजिलेंस ऑफिसर की ज़िम्मेदारी
जन-लोकपाल या लोकायुक्त के विजिलेंस अफसर को तीन काम करने पड़ेंगे-
  1. नागरिक का काम 30 दिन में करना होगा,
  2. हैड ऑफ डिपार्टमेण्ट और उस अफसर के ऊपर पैनल्टी लगाएगा, जो उनकी तनख्वाह से काटकर नागरिक को मुआवज़े के रूप में दी जायेगी।
  3. विभाग के अधिकारी और हैड ऑफ डिपार्टमेण्ट के खिलाफ भ्रष्टाचार का मामला शुरू किया जायेगा, तहकीकात शुरू की जायेगी और भ्रष्टाचार की कार्यवाही इन दोनों के खिलाफ की जायेगी. ये काम विजिलेंस अफसर को करना होगा।

इससे हमें यह उम्मीद है कि अगर हैड ऑफ डिपार्टमेण्ट के खिलाफ 3-4 पैनल्टी भी लग गई या 3-4 केस भी भ्रष्टाचार के लग गये तो वो अपने पूरे डिपार्टमेण्ट को बुलाकर कहेगा कि आगे से एक भी ऐसी शिकायत नहीं आनी चाहिए। इससे हमें ये लगता है कि आम आदमी के लेवल पर भी लोगों को तेज़ी से राहत मिलनी चालू हो जाएगी।

क्या जनलोकपाल भ्रष्ट नहीं होगा?


कुछ लोगों का यह कहना है कि लोकपाल के अन्दर अगर भ्रष्टाचार हो गया तो उसे कैसे रोका जायेगा? यह बहुत जायज बात है। इसके लिए कई सारी चीज़े इस कानून में डाली गई है। सबसे पहले तो ये कि लोकपाल के मैम्बर्स का और चैयरमेन का चयन जो किया जाएगा वो कैसे किया जाता है। वो बहुत ही पारदर्शी तरीके से किया जायेगा।

लोकपाल की नियुक्ति पारदर्शी और जनता की भागीदारी से
जन लोकपाल और जन लोकायुक्त में भ्रष्टाचार को रोकने के लिए यह सुनिश्चित किया जाएगा कि इस काम के लिए सही लोगों का चयन हो। लोकपाल के चयन की प्रकिया को पारदर्शी और व्यापक आधार वाला बनाया जाएगा। जिसमें लोगों की पूरी भागीदारी होगी। इसके लिए एक चयन समिति बनाई जाएगी। समिति में निम्नलिखित लोग होंगे -
(01) प्रधानमंत्री,
(02) लोकसभा में विपक्ष के नेता,
(03) दो सबसे कम उम्र के सुप्रीम कोर्ट के जज,
(04) दो सबसे कम उम्र के हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश,
(05) भारत के नियन्त्रक महालेखा परीक्षक, और
(06) मुख्य निर्वाचन आयुक्त होंगे।

चयन समिति भी सही लोगों का चयन करे
चयन समिति में जितने लोग शामिल हैं वे बहुत बड़े पद वाले लोग हैं, और भ्रष्टाचार के प्रभाव से मुक्त नहीं हैं। यह सभी लोग बहुत व्यस्त भी रहते हैं। अत: यह भी सम्भव है कि ये अपने मातहत अफसरों के माध्यम से अथवा किसी राजनीतिक दवाब में गलत लोगों को जनलोकपाल बना दें। इसलिए चयन समिति को जनलोकपाल के सदस्यों और अध्यक्ष पद के सम्भावित उम्मीदवारों के नाम देने का काम एक सर्च कमेटी करेगी।

लोकपाल के लिए योग्य व्यक्तियों की खोज के लिए सर्च कमेटी
चयन समिति योग्य लोगों का चयन उस सूची में करेगी जो उसे सर्च कमेटी द्वारा मुहैया करवाई जाएगी। सर्च कमेटी का काम होगा योग्य और निष्ठावान उम्मीदवारों के नाम चयन समिति को देना। सर्च कमेटी में सबसे पहले पूर्व सीईसी और पूर्व सीएजी में पांच सदस्य चुने जाएंगे। इसमें वो पूर्व सीईसी और पूर्व सीएजी शामिल नहीं होंगे जो दाग़ी हो या किसी राजनैतिक पार्टी से जुड़े हों या अब भी किसी सरकारी सेवा में काम कर रहे हों। यह पांच सदस्य बाकी के पांच सदस्य का चयन देश के सम्मानित लोगों में से करेंगे। और इस तरह दस लोगों की सर्च कमेटी बनाई जाएगी।

सर्च कमेटी का काम और जनता की राय
सर्च कमेटी विभिन्न सम्मानित लोगों जैसे- सम्पादकों, बार एसोसिएशनों, वाइज़ चांसलरों से या जिनको वो ठीक समझे उनसे सुझाव मांगेगी। इनसे मिले नाम और सुझाव वेबसाईट पर डाले जाएंगे। जिस पर जनता की राय ली जाएगी। इसके बाद सर्च कमेटी की मीटिंग होगी जिसमें आम राय से रिक्त पदों से तिगुनी संख्या में उम्मीदवारों को चुना जाएगा। ये सूची चयन समिति को भेजी जाएगी। जो लोकपाल के लिए सदस्यों का चयन करेगी। सर्च कमेटी और चयन समिति की सभी बैठकों की वीडियों रिकॉर्डिंग होगी। जिसे सार्वजनिक किया जाएगा। इसके बाद जन लोकपाल और जन लोकायुक्त अपने कार्यालय के अधिकारीयों का चयन करेगें। उनकी नियुक्ति करेंगे।

भ्रष्ट लोकपाल को हटाने की प्रक्रिया
लोकपाल के चयन को पूरी तरह से पारदर्शी और जनता के भागीदारी से किया जा रहा है। अगर लोकपाल भ्रष्ट हो जाता है तो उसको निकालने की कार्यवाही भी बहुत सिम्पल है। कोई भी नागरिक सुप्रीम कोर्ट में शिकायत करेगा, सुप्रीम कोर्ट को हर शिकायत को सुनना पड़ेगा। पहली सुनवाई में अगर सुप्रीम कोर्ट को लगता है कि पहली नज़र में मामला बनता है तो सुप्रीम कोर्ट एक जांच बैठाएगी, तीन महीने में जांच पूरी होनी होगी और अगर जांच में कोई सबूत मिलता हैं तो सुप्रीम कोर्ट उस मेम्बर को निकालने के लिए राष्ट्रपति को लिखेगा और राष्ट्रपति को उस मैम्बर या चैयरमेन को निकालना पड़ेगा।

क्या जन लोकपाल दफ्तर में भ्रष्टाचार नहीं होगा?


दो महीने में सख्त कार्रवाई
अगर लोकपाल या लोकायुक्त के किसी स्टाफ के खिलाफ कोई भ्रष्टाचार की शिकायत आती है तो उस शिकायत को लोकपाल में किया जायेगा और उसके ऊपर एक महीने में जांच पूरी होगी और अगर जांच के दौरान उस स्टाफ मैम्बर के खिलाफ अगर कोई सबूत मिलता है तो उस स्टाफ को अगले एक महीने में नौकरी से सीधे निकाल दिया जायेगा ताकि वो जांच को बेईमानी से न करे।

कामकाज पारदर्शी होगा
लोकपाल के अन्दर की काम-काज की प्रक्रिया को पूरी तरह से पारदर्शी बनाने के लिये इसमें लिखा गया है- जब जांच चल रही होगी तब जांच से सम्बंधित सारे दस्तावेज़ भी पारदर्शी होने चाहिए। लेकिन ऐसे दस्तावेज़ जिनका सार्वजनिक होना जांच में बाधा पहुंचा सकता है, उन्हें तब तक सार्वजनिक नहीं किया जाएगा जब तक कि लोकपाल ऐसा समझता है। लेकिन जांच पूरी होने के बाद किसी भी केस में सारे दस्तावेज़ उस जांच से सम्बंधित वेबसाइट में डालने जरूरी होंगे। ताकि जनता ये देख सकें कि इस जांच में हेरा फेरी तो नहीं हुई।
दूसरी चीज, हर महीने लोकपाल / लोकायुक्त को अपनी वेबसाइट पर लिखना पड़ेगा कि किस-किस की शिकायतें आईं, शिकायतें किस-किस के खिलाफ आई, मोटे-मोटे तौर पर शिकायत क्या थी, उस पर क्या कार्यवाई की गई, कितनी पेण्डिंग है, कितनी बन्द कर दी गई, कितने में मुकदमें दायर किये गये, कितनों को नौकरी से निकाल दिया गया या क्या सज़ा दी गई ये सारी बातें लोकपाल / लोकायुक्त को अपनी वेबसाइट पर रखनी होंगी।

शिकायतों की सुनवाई जरूरी
कई बार देखने में आया कि जांच ऐजेंसी के अधिकारी शिकायतों पर कार्यवाही नहीं करते और सेटिंग करके जांच को बन्द कर देते है। और जो शिकायतकर्ता है उसको कुछ भी नहीं बताया जाता कि जांच का क्या हुआ। इसीलिए यहां के कानून में यह प्रावधान डाला गया है कि किसी भी जांच को बिना शिकायतकर्ता को बताए बन्द नहीं किया जायेगा। हर जांच को बन्द करने के पहले शिकायतकर्ता की सुनवाई की जायेगी और अगर जांच बन्द की जाती है तो उस जांच से सम्बंधित सारे कागज़ात खुले पब्लिक में वेबसाईट पर डाल दिये जायेंगे ताकि सब लोग देख सकें कि जांच ठीक हुई है या नहीं।
आप भाई लोगो से निवेदन है | की आप सब इस पे अपने विचार जरुर रखे

8.5.11

अन्ना हजारे कहा लुप्त हो गए,?

मेरे प्यारे दोस्तों और ब्लोगेर वासियों आज कल अपने अन्ना हजारे के बारे में सोचना बंद कर दिया है जेसे मीडया ने बंद कर दिया है

कभी सोचा है अन्ना हजारे कहा लुप्त हो गए,आज कल नज़र नहीं आते?
इसका कारण है पैसा,उनके नाम पर जितना मीडिया कमा सकता था कमा लिया,अब वो आउट ऑफ़ डेट हो गए है,उनसे कमाई नहीं हो सकती,इसी लिए वो हाशिये पर धकेल दिए गए है!
मीडिया को रोज़ नए नायक की जरुरत होती है भले ही वो दिग्गी जैसे लोग हो या ओसामा इससे कोई फर्क नहीं पड़ता!
फर्क सिर्फ कम होती टी.आर.पी से पड़ता है!
रोज़ पाकिस्तान हमे ललकारता है,सीमा पर गोली बारी करता है,लेकिन हम चुप रहते है पता है क्यों?
भारतीय राजनीती के शिखर पर ठंडा गोश्त(मनमोहन सिंह) काबिज है जिसमे गर्मी आने की गुंजाईश ना के बराबर है!
साथियों इस गन्दी राजनीती में गरम खून(युवा) जब तक झाड़ू लेकर नहीं उतरेगा तब तक इन देशद्रोही मकड़ियो से निजात पाना नामुनकिन है!
दिग्विजय एक टेप रेकॉर्डर है जो बो बोलता है,वो वो नहीं बोलता,उसके अन्दर लगी कैसेट बोलती है जो १० जनपथ देहली से डव की जाती है!
अमेरिका ने कहा है की वो सीमा पार करके आतंकवादियों को मारने की किसी भारतीय कार्यवाही का समर्थन नहीं करेगा!
बड़े दुःख की बात है पंडित जी खुद तो बैंगन खाए दूसरो को परहेज की नसीहत दे!
साथियों
हम क्या बोर्डर पार करेंगे?
हमने तो जब भी नहीं किया जब पाकिस्तानी कुत्ते हमारी सीमा में घुस कर हमरे पिछवाड़े पर गोली मार गए कारगिल में!
हमने तो तब भी नहीं किया जब मुंबई में आकर हमारी ही जमीन पर खड़े होकर हमारे ही मुह में मूत गए,अब क्या करेंगे!
भला हो आर्मी का जो हमे बचा लेती है,ये नेता तो हमारा फातिहा पढवाने में कोई कोर कसर अपनी तरफ से नहीं छोड़ते!
जय क्रांति जय हिंद

दिनेश पारीक

5.5.11

धोखा दे रहे हैं अन्‍ना : ये जन की नहीं एलीट ग्रुप की कमेटी है


धोखा दे रहे हैं अन्‍ना : ये जन की नहीं एलीट ग्रुप की कमेटी है

अन्ना हजारे का कद इस आंदोलन के बाद बहुत बड़ा हो गया है उन्होंने मुख्यमंत्रियों को प्रमाण-पत्र बांटना शुरू कर दिया है, लेकिन पहले अन्य बातों का जिक्र करुंगा उसके बाद आउंगा प्रमाण पत्र पर। सबको मालूम है मैं शराबी नहीं, कोई पिलाये तो मैं क्या करुं। कुछ इसी तर्ज पर चल रहा है यह सारा ड्रामा। मैं गांधीवादी हूं, अब कोई मुझे भ्रष्ट बना दे तो मैं क्या करुं। आजतक यह मुल्क नहीं जान पाया कि नेहरू के लिये गांधी जी की कमजोरी का राज क्या था? वह कौन सा कारण था जिसके कारण गांधी जी सुभाष चन्द्र बोस को कांग्रेस के अध्यक्ष पद से हटाने के लिये परेशान हो गये थे और अन्तोगतवा हटाकर ही दम लिया।
बजाज और बिरला की सुभाष चन्द्र बोस से क्या दुश्मनी थी? सुभाष चन्द्र बोस में क्या खामी थी? ठीक वैसा ही प्रश्न आज फ़िर खड़ा हुआ है। इस बार भी हथियार वही अनशन का है। सरकार और अन्ना के बीच समझौता हो गया लेकिन प्रश्न अभी भी कायम है। जब टूजी घोटाले में अहम खुलासे हो रहे थे और कुछ नामी बिजनेसमैन तथा पत्रकार उसकी चपेट में आ चुके थे तथा कानून को जानने वाले यह अनुमान लगा रहे थे कि बहुत जल्द कुछ सनसनीखेज गिरफ़्तारी होगी, सीबीआई के द्वारा ए राजा के खिलाफ़ चार्जशीट दाखिल की जा चुकी है। अभी उस चार्जशीट पर चर्चा करने की जरूरत थी, यह देखना था कि सीबीआई ने सही तरीके से साक्ष्य इकट्ठे किये हैं या मनमोहन सिंह या अन्य मंत्रियों के खिलाफ़ साक्ष्य आये है या नहीं, करुणानिधि और उनके कुनबे के खिलाफ़ क्या साक्ष्य सीबीआई ने इकट्ठे किये हैं? लेकिन ठीक उसी वक्त अन्ना का यह ड्रामा जो पूर्व घोषित था शुरू हुआ।
पांच दिन तक चलने के बाद इस ड्रामे का पहला एपिसोड खत्म हुआ। अन्ना के इस समझौते में आमजन की हार हुई और एलीट क्लास जन की जीत यानी 8 से 10 लोग जो खुद को सिविल सोसायटी कहते हैं उनकी जीत हुई। इसमे सरकार नहीं झुकी, अगर कोई झुका-टूटा तो इस देश की टी शर्टआम जनता, जिसके प्रतिनिधि बन गये एलीट क्लास के कुछ लोग। अन्ना के इस पूरे आंदोलन को मैं एक धोखा मानता हूं, देश के करोड़ों लोगों को छलने का पाप। एलीट क्लास के कुछेक लोग जो सिविल सोसायटी का लबादा ओढ़कर पूरे देश की जनता के घोषित (अघोषित नहीं क्योकि उन्होंने शुरुआत ही की जन लोकपाल नाम से) प्रतिनिधि बन बैठे। यह पूरा ड्रामा देश की जनता का भ्रष्टाचार के खिलाफ़ बढ रहे आक्रोश को खत्म करने या कम से कम शांत करने के लिये था और वही हुआ। लेकिन इस ड्रामे के कारण इमानदार पत्रकारों की जिम्मेवारी बढ़ गई। किसको बचाने के लिये अन्ना का ड्रामा शुरू हुआ था, यह पता लगाना पत्रकारों का दायित्व है।
दूसरी बात जो पांच नाम अपने चहेतों के अन्ना ने सुझाये हैं लोकपाल के सदस्य के रूप में उनकी असलियत को जनता के सामने लाना जरुरी है। शांति भूषण, प्रशांत भूषण यानी डायनेस्टी यहां भी। हेगडे़, केजरीवाल तथा खुद अन्ना। ये वह नाम हैं जो अभी तक प्राप्त सूचना के अनुसार अन्ना ने दिये हैं। सबसे पहले मैं बखिया उधेड़ता हूं, अन्ना के ड्रामे का। पारदर्शिता की बात करने वाले अन्ना ने सरकार के नुमाइंदों से सारी बातें बहुत ही गुप्त तरीके से की। क्या-क्या बातें हुईं किसी को नहीं पता। सिर्फ़ अन्ना के दूत और सरकार के प्रतिनिधि जानते हैं। यह कैसी पारदर्शिता थी माननीय अन्ना जी। जो लोग सहानुभूति दिखाने के लिये बोट क्लब पर जमे थे उनको अंधेरे में क्यों रखा? सरकार और अन्ना के दूतों के बीच क्या चल रहा है उसे पूरी परदर्शिता के साथ उन समर्थकों को क्यों नहीं बताया? सहमति के पहले देश की जनता से राय क्यों नही ली?
अब आता हूं अन्ना के द्वारा प्रस्तावित नामों पर। केजरीवाल के बारे में मैं इसके अलावा ज्यादा नहीं जानता कि वह भारतीय रेवेन्यू सेवा में थे और बहुत सारे मलाइदार पद पर रह चुके हैं। इस एलीट बिल के परिभाषा वाली धारा 2 में परिभाषित व्हिसल ब्लोअर वाला प्रावधान केजरीवाल की देन है, जिसके तहत सरकारी सेवक यानी आला अधिकारियों के तबादले, प्रोन्नति, उनके खिलाफ़ विभागीय कार्रवाई जैसे मसले की सुनवाई भी लोकपाल के दायरे में आयेगी। पहले इसके लिये कैट की व्यवस्था थी और कैट के खिलाफ़ अभी तक भ्रष्टाचार की बहुत कम शिकायतें सामने आई हैं। कैट के कुछ फ़ैसले तो बहुत ही अच्छे माने गये हैं, उन फ़ैसलों में से एक रहा है सरकारी ठेके में काम कर रहे मजदूर को भी कैट ने केन्द्र सरकार के अधीन काम करनेवाला मानते हुये क्षतिपूर्ति का आदेश दिया था। अब अन्ना ब्रांड एलीट लोकपाल लागू हो जाने के बाद कैट की कोई जरूरत नहीं रह जायेगी या फ़िर कुछेक मामलों की सुनवाई लोकपाल ही करेगा। किसी भी अधिकारी पर कोई भी विभागीय कार्रवाई होगी तो वह इसे पूर्वाग्रह से ग्रसित कहते हुये लोकपाल का दरवाजा खटखटाना शुरू कर देगा।
खैर अब तो एक नई समिति नये सिरे से लोकपाल बिल ड्राफ़्ट करेगी और उस समय देखा जायेगा कि यह तीसरा मिला-जुला लोकपाल बिल क्या है। मैं केजरीवाल के बारे में प्रभाष जोशी द्वारा कही गई बातों के अलावा कुछ विशेष नहीं जानता इसलिये उनके चरित्र और कार्य के बारे में फ़िलहाल कोई टिपण्णी नहीं करुंगा. अन्ना हजारे के बारे में बहुत कुछ पढ़ चुका हूं, सुन चुका हूं और महाराष्‍ट्र के कुछेक मित्रों ने भी बताया है, सबकुछ ठीक-ठाक तो नहीं है फ़िर भी अभी और तहकीकात कर रहा हूं, इसलिये उनके उपर भी कोई टिपण्णी नहीं करुंगा। अब बच गये जज संतोष हेगडे़, शांति भूषण और प्रशांत भूषण तो इन तीनों महानुभावों को लोकपाल ड्राफ़्ट बनाने वाली समिति का सदस्य बनाने का मैं विरोधी हूं। इस देश का कोई न्यायाधीश यह नहीं कह सकता कि उसने निर्दोष को सजा नहीं दी है, कारण है न्यायिक व्यवस्था। संतोष हेगडे़ उच्चतम न्यायालय तक पहुंचे हैं, बहुत पाप करने के बाद ही वह मुकाम हासिल होता है, अपने से सीनियर जजों की चमचागीरी, तरक्की के लिये निर्दोषों को सजा देने जैसे कार्य को सीढ़ी की तरह इस्तेमाल किया जाता है। संतोष हेगडे़ सदस्य बनने की योग्यता नहीं रखते।
शांति भूषण तथा प्रशांत भूषण को सबसे पहले यह बताना पडे़गा कि कितना इनकम टैक्स की चोरी किये हैं। इनकम टैक्स की चोरी सभी बडे़ वकील करते हैं। फ़ीस की कोई रसीद तो दी नहीं जाती। चूकिं मैं स्वंय प्रशांत भूषण से एक मुकदमा, जो मेरे क्लाइंट का था, उसके संबंध में बात कर चुका हूं। फ़ीस की बात तो छोड़ दें किसी बनिया से भी बडे़ बनिया हैं प्रशांत जी। दोनों पिता-पुत्र भी सदस्य बनने की योग्यता नहीं रखते। 25 हजार से लेकर 40 हजार तक फ़ीस का दायरा है प्रशांत भूषण का। वह भी तब जब एसएलपी की ड्राफ़्टिंग दूसरे ने की हो। दूसरी बात दोनों भूषण से ज्यादा योग्य-काबिल तथा ईमानदार वकील उच्चतम न्यायालय में हैं, जो वास्तव में लोकपाल बिल को ड्राफ़्ट करने की योग्यता रखते हैं। वेणु गोपाल से लेकर सोली सोराब जी जैसे अनेकों नाम हैं। एक और बहुत बड़ी गलती शांति भूषण ने की है। अवमानना के एक मुकदमे में, जो उनके पुत्र के उपर उच्चतम न्यायालय में चल रहा है, उसमे एक बंद लिफ़ाफ़ा उच्चतम न्यायालय में दाखिल किया था। उस लिफ़ाफ़े में उच्चतम न्यायालय के भ्रष्ट जजों का नाम था, आज तक हिम्मत नहीं हुई उन नामों को उजागर करने की। कारण सिर्फ़ न्यायालय का डर। जो आदमी इतना कायर हो कि कोर्ट के डर से भ्रष्टाचारियों का नाम नहीं उजागर करे वह किसी भी स्तर पर जन आंदोलन से जुड़ने की योग्यता नहीं रखता।
अब यह अन्ना के उपर है कि वे इन तीनों का नाम वापस लेते हैं या इनको योग्य होने का प्रमाण-पत्र देते हैं। वैसे अन्ना अब मुख्यमंत्रियों को भी प्रमाणपत्र देने लगे हैं। हालाकि अन्ना के प्रमाण-पत्र देने के बाद भी मैं खिलाफ़ ही रहूंगा। मैंने अन्ना को एक पत्र लिखना शुरू किया था जिसमें कुछ सवाल थे, परन्तु अन्ना ने अनशन तोड़ दिया इसलिये अब उस पत्र में कुछ संशोधन के साथ अन्ना को भेजूंगा। जवाब तो देना ही होगा। मेरे जैसे लोग भेड़ नहीं बन सकते और भेड़ से अलग मानसिकता वाले करोड़ों लोग हैं इस मुल्क में। पत्रकारों से एक ही गुजारिश है, वे अनशन के पीछे के सच को सामने लायें। इसके लिये बहुत मेहनत की जरूरत नहीं है। दिल्ली में बैठा कोई भी ईमानदार पत्रकार यह कर सकता है। बस आप टेंट से लेकर सारा साजो सामान जो लगा था धरना स्थल पर, वह किसने लगवाया तथा उसका भुगतान किसने किया यह पता लगाना शुरू कर दें सच सामने आ जायेगा।
एक और ड्रामे का जिक्र भी यहां कर देता हूं, हालांकि उसका इस पूरे प्रकरण से कोई नजदीक का रिश्ता नहीं है बस सिर्फ़ रोटी सेंकने और अपने मुंह मियां मिठ्ठू बनने वाली बात है। चूंकि मेरे खुद के राज्य बिहार से जुड़ा है इसलिये जिक्र कर रहा हूं वरना जरूरत भी नहीं थी। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बडे़ जोश-खरोश के साथ स्वागत किया अन्ना का और अपने बयान में कहा कि बिहार भ्रष्टाचार विरोधी कानून बनाने वाला पहला राज्य है, उन्होंने अन्य राज्यों से इसी तरह का कानून बनाने की अपील की है। बिहार में एक अधिकारी है आईएएस हैं फ़िलहाल पटना के कमिश्नर हैं नाम है केपी रमैया। यह बिहार के भ्रष्टतम अधिकारियों में से एक हैं। इन्‍होंने सरकार की जमीन को भी निजी हाथ में सौपने का काम किया है। मैं एक बार नहीं दसियों बार नीतीश को ई-मेल भेजकर इसके खिलाफ़ जांच की मांग कर चुका हूं। इस पाखंडी नीतीश की हिम्मत नहीं हुई जांच कराने की। आज भी मैं अपने मांग पर डटा हुआ हूं। सीबीआई से केपी रमैया के खिलाफ़ जांच कराओ। मेरे पास बहुत सारे तथ्य भी हैं। नीतीश को भी अन्ना ने ग्राम सभा के क्षेत्र में काम करने के लिये प्रमाण पत्र दिया है। अन्ना के प्रमाण-पत्र की बात पढ़कर मुझे बहुत हंसी आई और अन्ना की बुद्धि पर तरस भी आया।
बिहार में ग्राम सभा लूट का सबसे बड़ा केन्द्र बन चुकी है। नरेगा, आंगनबाड़ी, राशन दुकान, शिक्षकों की बहाली जैसे कार्यों में सिर्फ़ भ्रष्टाचार है। सारे मुखिया भ्रष्ट हैं। अन्ना को मेरी चुनौती है, मात्र 50 मुखिया बताओ जो आपको को भ्रष्टाचारी न लगे अन्यथा यह बताओ कि आपने किस आधार पर बिहार की ग्राम सभाओं की प्रशंसा की। अन्ना हजारे जी आप बुजुर्ग हैं, आपने बहुत सारे अच्छे और प्रशंसनीय सामाजिक कार्य किये हैं, लेकिन मैं उन गदहों में  से नहीं हूं जो आंख मूंदकर आपकी सभी वाहियात और फ़ालतू बातों पर विश्वास कर ले। आगे से मेरा सुझाव है कि इस तरह की तथ्यहीन बात न करें अन्यथा आप हंसी के पात्र बनकर रह जायेंगे। अब बंद करता हूं फ़िर मिलेंगे जब शुरू होगा अन्ना का अगला एपिसोड। अन्ना के आंदोलन की मार्केटिंग भी शुरू हो चुकी है। एक टी शर्ट बनाने वाली कंपनी का अन्ना ब्रांड शर्ट की तस्वीर भी भेज रहा हूं।


1.5.11

फकीर अन्‍ना हजारे की टीम के करोड़पति


फकीर अन्‍ना हजारे की टीम के करोड़पति


अन्ना हजारे ने  जनलोकपाल बिल की ड्राफ़्टिंग समिति के लिये अपने अलावा चार अन्य लोगों के नाम सुझाये थे। ये नाम हैं जज संतोष हेगडे, पिता-पुत्र शांति भूषण एवं प्रशांत भूषण तथा अरविंद केजरीवाल। ये चारो व्यक्ति ड्राफ़्ट कमेटी के सदस्य हैं। उन चारो सदस्यों की संपति के जो आकडे़ प्रकाशित हुये हैं उसके अनुसार सबसे ज्यादा संपत्ति के मालिक हैं शांति भूषण, ये केन्द्र में मंत्री भी रह चुके हैं। इनकी संपत्ति में शामिल है नोएडा में चार मकान/फ़्लैट,  इलाहाबाद के एक घर में एक चौथाई हिस्सा, बंगलोर में एक फ़्लैट तथा रूड़की में खेती योग्य भूमि,  इसके अलावा बांडस, मुचुअल फ़ड तथा ज्वेलरी की लागत आंकी गई है   2, 09, 72, 80, 000  यानी शांति भूषण जी अरबपति हैं। फ़िर एक बार याद दिला देता हूं कि शांतिभूषण जी केन्द्रीय मंत्री रह चुके हैं।
दूसरी पायदान पर हैं शांतिभूषण जी के पुत्र प्रशांत भूषण,  इनकी अचल संपति में शामिल है दिल्ली में फ़्लैट, जंगपुरा में मकान, हिमाचल प्रदेश के कंदबारी में जमीन तथा मकान, इलाहाबाद के घर में एक चौथाई हिस्सा तथा चल संपत्ति 2, 22, 50, 000  (दो करोड़, बाइस लाख, पचास हजार)। तीसरी पायदान पर हैं जज संतोष हेगडे़, इनकी तथा इनकी पत्नी शारदा हेगडे़ के बैंक खाते में जमा हैं तीस लाख से ज्यादा की राशि,  इनका एक फ़्लैट बंगलोर के रिचमंड टाउन में है,  जिसकी कीमत है डेढ़ करोड़ रुपए। यानी तकरीबन दो करोड़ की संपत्ति के मालिक ये भी हैं। वैसे अगर इनकी संपति का आंकड़ा सही है तो संतोष हेगडे़ इमानदार दिखते हैं. एक उच्चतम न्यायालय का जज जब बेइमान हो जायेगा तो उसकी संपत्ति अरबों में होगी।
चौथी पायदान पर हैं केजरीवाल,  इनके पास आईआरएस ग्रुप हाउसिंग सोसायटी इन्द्रापुरम में एक प्लाट है जिसकी कीमत 55 लाख रुपये है। इसके अलावा 28 हजार का बैंक बैलेंस, अगर ये आंकडे़ सही हैं तो अरविंद केजरीवाल भी ईमानदार दिखते हैं, हां यह अलग बात है कि नौकरी छोड़ने के पहले प्लाट का जुगाड़ आईआरएस सोसायटी में बैठा लिया था। सबसे अंतिम पायदान पर खुद अन्ना हैं वाकई एक फ़कीर,  अपनी ढाई एकड़ जमीन में से मात्र 7 डिसमिल छोडकर, जो उनके परिवार वालों का है,  बाकी जमीन गांव के उपयोग के लिये दे चुके हैं, बैंक बैलेंस है 67 हजार रुपये और नगद राशि डेढ़ हजार। अन्ना की टीम के दो सदस्यों यानी पिता-पुत्र की संपति चौंकानेवाली है। खैर जो है सो है। मेरी सलाह है दोनों पिता-पुत्र को,  कि पहले जरूरत भर रखकर के बाकी संपति को दान करके आएं तब भ्रष्टाचार के खिलाफ़ लड़ाई की बात करें।

30.4.11

'बयान वापस लिए' कहानी जारी है...


'बयान वापस लिए' कहानी जारी है...

लौह-सा दिखता वो वृद्ध पुरुष धीमे-धीमे पिघलने लगा है। आलोचना की गर्मी से या किन्ही और कारणों से... निश्चिततौर पर आलोचना की गर्मी से यह संभव नहीं। महाराष्ट्र के एक गांव रालेगन सिद्धि का यह जनयोद्धा दिल्ली आकर महान से महामानव, अन्ना हजारे से छोटा गांधी और भ्रष्टाचार से लडऩे के लिए आमजन का सूरज बन गया था। जब अन्ना ने दिल्ली का रण संभाला था, उसी दिन मैंने सोचा था कुछ न कुछ तो जरूर होगा, क्योंकि यह आदमी विजयपथ पर निकलता है तो न रुकता है, न थकता है और न झुकता है। हुआ भी यही, लेकिन भ्रष्टाचार के खिलाफ इस जंग में जंतर-मंतर के रणक्षेत्र से सचिवालय में हुई संयुक्त कमेटी की पहली बैठक तक जो हुआ उससे मैं अचरज में हूं। चट्टान सा दिखने वाला पुरुष लगातार समझौतावादी होता जा रहा है।
धीमे-धीमे  वे उन बातों को पीछे छोड़ते चले जा रहे हैं जिन पर जनता का समर्थन उन्हें मिला था। पहले कमेटी के अध्यक्ष पद पर समझौता, फिर शनिवार को बैठक में मसौदे पर समझौता। रविवार को तो हद हो गई उन्होंने संसद को सर्वोपरि बताते हुए कह दिया कि यदि प्रस्तावित बिल को संसद रिजेक्ट भी कर दे तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं। हालांकि मैं भी संसद को ही सर्वोपरि मानता हूं, लेकिन संसद के हिसाब से ही चलना था तो फिर इतना तामझाम क्यों फैलाया, क्यों लोगों की भावनाओं को उद्वेलित किया? क्यों लोगों का मजमा लगवाया? क्यों फोकट में अग्निवेश जैसे माओवादी और नक्सलियों के समर्थक को मंच साझा करने दिया? क्यों बेवजह प्रोफेशनल एनजीओ संचालकों को हीरो बनवा दिया? सबसे बड़ा सवाल आखिर क्यों भ्रष्टाचार के खिलाफ बाबा रामदेव के आंदोलन को छोटा साबित करने की कोशिश की गई? क्यों घोटालों के आरोपों से घिरी कांग्रेस नीत यूपीए सरकार से लोगों का ध्यान भटकाया? बहुत से सवाल हैं जिनके जवाब भी अन्ना हजारे को ही देने पड़ेंगे। वे इन सवालों के जवाब दिए बिना अपने गांव रालेगन सिद्धि वापस नहीं लौट सकते।
खैर, इसी दौरान अन्ना ने गुजरात के विकास प्रतीक मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी और बिहार को जातिगत राजनीति से उबारने वाले नीतीश कुमार की तारीफ में चंद लफ्ज बयां किए थे। एक तो अन्ना हजारे भ्रष्टाचार के खिलाफ बिगुल फूंक कर भ्रष्ट नेताओं ने निशाने पर पहले ही चढ़ गए थे। ऊपर से मोदी और नीतीश की तारीफ कर बर्र के छत्ते में हाथ दे मारा। नेताओं के साथ-साथ तथाकथित सेक्यूलरों की जमात भी उनके पीछे पड़ गई। उनके अपने भी विरोधियों जैसे बयान जारी करने लगे। नरेन्द्र मोदी ने इस पर चिट्ठी लिखते हुए अन्ना को आगाह किया कि अब आपका का तीव्र विरोध होगा, क्योंकि आपने मेरी तारीफ कर दी है। मेरे धुर विरोधी और अपने मुंह मियां मिट्ठू बनने वाले सेक्यूलर आपका कुर्ता खीचेंगे। आखिर में मोदी की शंका सत्य सिद्ध हुई। अन्ना हजारे पर लगातार भड़ास निकाली जाने लगी। आखिर उन्होंने अकरणीय कार्य (मोदी की तारीफ) जो कर दिया था।
इसके बाद चर्चाओं का केन्द्र बिन्दु बदल गया। भ्रष्टाचार के खिलाफ और जन लोकपाल विधेयक को पारित कराने के लिए अन्ना की आगे की रणनीति क्या होगी? इस पर बहुत ही कम बात होने लगी। बात हो रही थी तो इस पर कि क्या अन्ना हिन्दुवादी मानसिकता के हैं? क्या हजारे की विचारधारा हिन्दुवादी है? क्या अन्ना राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कार्यकर्ता हैं या फिर उसके किसी अनुसांगिक संगठन के। इन चर्चाओं ने जोर पकड़ लिया। यह सब चल ही रहा था कि इसी बीच फिर वही कहानी दोहराई गई। कहानी गुजरात के प्रतीक पुरुष नरेन्द्र मोदी के बारे में जो भी शब्द कहे उन्हें वापस लेने की। मोदी की तारीफ से आलोचना के शिकार बने अन्ना ने मोदी की तारीफ में कहे तमाम लफ्जों को समेटना शुरू कर दिया।
उन्होंने कहा कि मोदी के आलोचकों के द्वारा मोदी पर लगाए गए आरोपों में सच्चाई है तो मैं अपना बयान वापस लेता हूं। उन्होंने यह भी कहा कि मोदी और गुजरात के अच्छे कामों की तारीफ के बाद मुझे कई ई-मेल और पत्र आए। उनमें कहा गया कि गुजरात में कोई विकास नहीं हुआ है। मुझे नहीं मालूम कि इसमें सच्चाई क्या है, लेकिन अगर सच्चाई है तो मैं अपने बयान वापस लेता हूं। सामान्यतौर पर कोई भी साधारण आदमी अन्ना की इस बात पर विश्वास नहीं कर सकता कि उन्हें इस बात का इल्म न होगा कि गुजरात और बिहार में विकास कार्य हुए हैं या नहीं। इस बात पर भी कोई यकीन नहीं करेगा कि अन्ना बिना जानकारी के कोई बयान दे सकते हैं। तो क्या इसके पीछे विरोधियों का लगातार विरोधी प्रचार-प्रसार एक कारण हो सकता है? जो भी हो एक बार फिर नरेन्द्र मोदी की तारीफ में प्रस्तुत फिल्म का दि एण्ड वही निकला... मैं अपने बयान वापस लेता हूं।
नरेन्द्र मोदी के संदर्भ में ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। इससे पहले भी कई लोग उनकी तारीफ करने के बाद अपने बयान वापस ले चुके हैं। प्रसिद्ध इस्लामिक संस्था दारुल उलूम देवबंद के नवनियुक्त कुलपति मौलाना गुलाम मोहम्मद वस्तानवी ने भी पहले तो नरेन्द्र मोदी की उनके द्वारा गुजरात में कराए गए विकास कार्यों के लिए तारीफ की। इसके बाद तो कट्टरपंथी मुल्ला और सेक्यूलर जमात हाथ-पैर धोकर उनके पीछे ही पड़ गई। आखिर में मौलाना वस्तानवी को पीछे हटना पड़ा और उन्होंने भी मोदी की तारीफ में कहे शब्द वापस ले लिए। फिर कहानी में नया किरदार आया, भारतीय सेना में मेजर जनरल आईएस सिंघा। मेजर जनरल सिंघा ने अहमदाबाद में 'सेना को जानो'  प्रदर्शनी के उद्घाटन भाषण के दौरान मोदी की तारीफ करते हुए कहा कि मोदी में सेना का कमाण्डर बनने के सभी गुण हैं। मोदी की प्रशंसा मेजर जनरल साहब को महंगी पड़ गई। सेना के उच्चाधिकारियों ने उन्हें तलब कर लिया।
वहीं मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के सांसद एपी अब्दुला कुट्टी को तो मोदी की प्रशंसा करने पर पार्टी से निष्कासन झेलना पड़ा। यह तो होना ही था, क्योंकि कम्युनिस्ट पार्टी के लिए तो नरेन्द्र मोदी वैसे भी राजनीतिक अछूत हैं। उनकी तारीफ करने पर निश्चित ही अब्दुला कुट्टी साहब अशुद्ध हो गए होंगे, तभी तो पार्टी ने उनसे कुट्टी कर ली, उन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया। गुजरात का ब्रांड एंबेसेडर बनने पर सदी के महानायक अमिताभ बच्चन की भी खूब किरकिरी हुई। दशों दिशाओं से एक ही आवाज आ रही थी अमिताभ को गुजरात का ब्रांड एंबेसेडर  नहीं बनना चाहिए। लेकिन अमिताभ बच्चन ने अपने कदम वापस नहीं लिए, पैसा इसके पीछे का एक कारण हो सकता है। खैर जो भी हुआ, इस मुद्दे पर अमिताभ पर कीचड़ तो खूब उछाली ही गई थी। हाल ही 'बयान वापस लिए' नामक कहानी में नए किरदार की एंट्री हुई है। लेखन के क्षेत्र में खासा नाम कमाने वाले चेतन भगत ने उनकी प्रशंसा करने की जुर्रत की है। चेतन ने कहा कि नरेन्द्र मोदी को राजनीति के राष्ट्रीय मंच पर आकर कमान सम्भालनी चाहिए। वे अच्छे वक्ता हैं, अच्छे नेता हैं। मोदी ने चेतन को भी चेता दिया है कि सावधान रहना, अब तुम पर मेरे विरोधी निशाना साधेंगे। अब देखना बाकी है कि इस कहानी का अंत किस तरफ जाता है...

27.4.11

एक पत्र, अन्ना के नाम


एक पत्र, अन्ना के नाम

प्रिय श्री अन्ना हज़ारे जी, आपके आन्दोलन को मिल रहा अपार जनसमर्थन इस बात का द्योतक है कि लोग व्यवस्था में बदलाव चाहते हैं. टीवी देख कर, समाचार पत्रों को पढ़ कर तो ऐसा लग रहा है कि अगर आपका आन्दोलन सफल हो गया तो भ्रष्टाचार फिर किताबों में ही पढ़ने को मिलेगा या फिर दादी-नानी के किस्से कहानियों में. ऐसा होता है तो इससे अच्छा और क्या होगा, पर मैं दो-चार बातें कहना चाहूंगा. उपवास का मैं विरोधी नहीं, उपवास करना चाहिए. गाँधी जी भी करते थे और उन्होंने कहा भी है कि भोजन करना एक अशुचितापूर्ण कार्य है ठीक उसी तरह जैसे मल त्याग करना. अंतर सिर्फ इतना है के मल त्याग करने के बाद हम राहत महसूस करते है और भोजन करने के बाद बेचैनी.
अतः उपवास करना ठीक है, पर उपवास का उपयोग एक हथियार के रूप में अपनी बात मनवाने के लिए किया जाए ये कहाँ तक उचित है. ये ब्लैकमेलिंग है. प्रकारांतर से हिंसा है. एक बड़ा बौद्धिक वर्ग आपके साथ है, समर्थन में है फिर ये अतार्किक रास्ता क्यों. या तो आपके व उनके तर्कों व प्रयासों में दम नहीं के अपनी बात मनवा लें या फिर सरकार निरंकुश हो गयी है. हम आमजन के लिए दोनों ही स्थितियाँ खतरनाक हैं. समस्या दोनों तरफ है, दोनों ही आमजन से संवाद स्थापित करने की कला भूल गए हैं. ऐसे में एक ही रास्ता बचता है, अतिवाद का. आप भी वही कर रहे हैं. सरकार भी वही करेगी. सत्य और समाधान कहीं बीच में खो के रह जायेंगे.
आप जिस जनलोकपाल अधिनियम को पारित करना चाहते हैं, या कि जो सरकार लाना चाहती है वो कैसे समस्या का समाधान करेंगे मेरी समझ से परे है. कुल मिला के आप और सरकार दोनों सहमत हैं कि भ्रष्टाचार रहे, लोग पीड़ित भी होते रहें, तसल्ली ये रहे के भाई भ्रष्टाचारी को सजा मिलने की उम्मीद रहेगी. परिणामतः में एक और समस्याकारक संस्था हमारे सामने होगी. हम कितनी संस्थाएं एक के ऊपर एक बैठाते जायेंगे. ऐसी संस्थाएं बनाने से भ्रष्टाचार नहीं मिटता. किला मजबूत होने से दुश्मन के अन्दर आने का भय कम नहीं होता.
काश आप कोई ऐसी आयोजना करते कि भ्रष्टाचार के मूल पर प्रहार होता. आप जिस भ्रष्टाचार के खिलाफ हैं उससे कई गुना ज्यादा खतरनाक है बौद्धिक भ्रष्टाचार जो आपके, मेरे, हम सबके चारों ओर पसरा हुआ है, पर दीखता नहीं. ये आर्थिक भ्रष्टाचार इसी बौद्धिक भ्रष्टाचार की उपज है.
काश के आप कहते और आन्दोलन करते कि भाई देश में सभी के लिए एक न्यूनतम जीवन स्तर निर्धारित हो, जो कि ऐसा हो कि व्यक्ति सुविधापूर्ण जीवन जी सके. रोटी मिले, कपड़ा मिले, मकान मिले, बीमारी में चिकित्सा मिले, भविष्य के प्रति अनिश्चितता ना हो. असुरक्षा का भाव ना हो. लोगों के बीच प्रेम बढ़े, भाईचारा बढ़े. राज्य सबकी शिक्षा का प्रबंध करे. सभी एक साथ पढ़े, एक जैसे विद्यालय हो, एक जैसी सुविधाएं हों. समाज के एक बहुत बड़े वर्ग के साथ तो ऐसा घटना ही चाहिए तभी हम कह सकते हैं कि हम सुखी हैं. हमारा देश हमारा समाज सुखी है.
काश कि आप कहते और आन्दोलन करते कि भाई संविधान का अंगीकार किया जाना सामजिक संविदा एक थी. तो आओ उस संविदा का अनुपालन सुनिश्चित करें. संविधान कि वे उपबंध जो कि निर्जीव पड़े हैं उन्हें जीवित करें. वे कब तक काले कोट वालों के रहमो-करम पे पड़े रहेंगे. आप कहते कि अब समय आ गया है आर्थिक समानता को जड़ से उखाड़ फेंकने का. सिर्फ राजनितिक समानता से तो कुछ ख़ास हासिल नहीं होता. विनोबा ने भूदान के लिए कहा आप बड़े लोगों से अतिरिक्त पूँजी राज्य को वापस करने के लिए कहते. यूं पूँजीपति होना बुरा नहीं, अरबपति होना बुरा नहीं. पर एक कल्याणकारी समाजवादी राज्य में ये अखरता है कि जनता दो ध्रुवों में बंट जाए, एक छोर पे चंद अरबपति हों दूसरे पे आमजन, ये कैसे चलेगा ये नहीं चल सकता. और फिर क्यों चाहिए किसी को इतना पैसा. अगर कुछ के पास आवशयकता से अधिक है तो निश्चय ही बहुतों के पास आवशयकता से कम होगा या बिलकुल नहीं होगा. फिर कैसे मिटेगा भ्रष्टाचार कैसे बनेगा शांत सुखी और सम्रद्ध समाज.
हम वोट देते हैं, या नहीं भी देते हैं तो भी हैं तो इस देश के नागरिक. हम जन्मते हैं और बंध जाते हैं उसी सामाजिक संविदा से. जब हमें बाँधा जाता है तब हम कोई उपाय करने के लायक नहीं होते और जब हम उपाए करने के लायक होते हैं तब कोई उपाय रह नहीं जाता. काश आप इसके लिए कोई उपाय कोई आयोजना करते.
पर अफ़सोस अपने ऐसी कोई आयोजना, कोई उपाय नहीं किया. आप मूल पे प्रहार करने का प्रयास करते नहीं दिखते. आपने शरद पवार पे कई प्रश्न उठाये. ऐसे प्रश्न कई और मंत्रियों पे भी किये जा सकते हैं. ठीक भी है. तब आप कुछ ऐसा करते के शरद पवार के निर्वाचन क्षेत्र में जाते और जनता से सीधे संवाद करते उन्हें बताते के शरद पवार के कारनामे. आपके सहयोगी जैसे काले कोट वालों की संपत्ति का ब्यौरा जुटाते हैं वैसे ही शरद पवार की संपत्ति का भी जुटाते. जनता को सुझाते के ये आदमी देश समाज के लिए खतरा है, भ्रष्टाचार का पोषक है इसे वापस बुलाओ दोबारा कभी ना चुनना जब तक ये तौबा ना कर ले. हो सकता है ऐसा कोई उपाय निकल आता कि किसी जनप्रतिनिधि को वापस भी बुलाया जा सके. और आप वही से अपने अपना आन्दोलन संचालित करते. ओबी वैन वहां भी पहुँच जाती, रवीश कुमार वहां भी पहुँच जाते.
आप जनता को समझाते के भाई इन राजनीतिज्ञों को छोड़ दो. क्यों बंधक बनाये हो इन्हें जवानी से. क्यों मजबूर कर रहे हो इन्हें कि ये बार-बार एमपी बने. और अब तो तुमने इनके जवान-जवान बच्चों को भी एमपी बनने के लिए मजबूर कर दिया है. अब कोई कारण नहीं के इन बूढ़ों को ढोया जाय. पवार साहब 1967 से लगे हैं, प्रणब दा 1969 से लगे हैं और भी बहुत हैं जो परिवार समेत बस गए हैं संसद में. अब तो इनका बोरिया-बिस्तर बांधो. शायद कोई बात निकल के आती कि भाई चार-पांच बार से अधिक कोई क्यों संसद जाए. संसद है कोई ज़मींदारों का अड्डा नहीं.
अपने ऐसा नहीं किया, पर ऐसा तो करना पड़ेगा. आँखों में एक यूटोपिया तो रखना पड़ेगा. हमें अच्छे आदमी तो बनाने ही होंगे. जब देश और समाज सोचेगा ही नहीं अच्छे आदमी बनाने के बारे में तो कैसे चलेगा. जब इंसान को हिन्दू बनाया जा सकता है, मुस्लिम बनाया जा सकता है, सिख बनाया जा सकता है तो साथ ही उसे अच्छा इंसान भी बनाया जा सकता है. आज नहीं तो कल. आप नहीं तो कोई और. बिना ऐसे आमूलचूल परिवर्तन के कुछ हासिल होने वाला नहीं. आपने जाने अनजाने राजनीति को अवमूल्यित करने का प्रयास किया है. उसके प्रति विरक्ति का भाव निराशा का भाव पैदा करने का प्रयास किया है. ये मुझे स्वीकार नहीं. ऐसे प्रयास और भी सँस्थाए करती रहती हैं. उनमें दो प्रमुख हैं. मीडिया और मार्केट. पर भारत जैसे देश में राजनीति को हल्का करना एक खतरनाक और कुटिल प्रयास होगा.
हाँ एक बात है. आपको मिले समर्थन से ये स्पष्ट है के जनता बदलाव चाहती है. सही नेतृत्व की तलाश है. आपको देख के मुझे लगा कि हम लोग 'राजनीति' शब्द का प्रयोग क्यों करते हैं, इस शब्द का प्रयोग बंद कर देना चाहिए. जब राजा नहीं तो राजनीती कैसी. हमें कहना चाहिए 'जननीति'. और आप एक जननीतिज्ञ हैं.
सरकार तो खैर आपकी बात मानेगी ही. क्योंकि वे लोग जनता की नब्ज आपसे बेहतर समझते हैं. आप प्यारे इंसान हैं. हम आपको यूं मरने नहीं दे सकते. मैं कल अपने शहर बरेली के अयूबखां चौराहे पे जाऊंगा आपके समर्थन में मानव श्रृंखला बनाने. आपसे असहमति अलग बात है. पर जनता की आवाज में आवाज मिलाना ज़रूरी है. उम्मीद बंधी रहती है प्रदीप सर जैसे कुछ सच्चे कुछ निस्वार्थ लोगों से मिलकर, उनसे जुड़कर.
आभार
दिनेश पारीक 

22.4.11

अन्ना का आह्वान भ्रष्टाचार को उखाड़ फेंको

Hum Tum special article


किसन बाबूराव हजारे यानी अन्ना हजारे के बारे में कुछ लिखना कलम के साथ न्याय करना नहीं होगा, क्योंकि उनकी निस्वार्थ खूबियों की कतार इतनी लम्बी है कि समय के बीतने का एहसास नहीं होता। पद्मभूषण और पद्मश्री जैसे राष्ट्रीय सम्मान पा चुके समाजसेवक अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार के खिलाफ एक बड़ी जंग छेड़ दी है। वे भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था के लिए जरूरी लोकपाल विधेयक की लड़ाई लड़ रहे हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ बिगुल बजाने वाले अन्ना हजारे से हाल ही हुई बातचीत के खास अंश।

आप भ्रष्टाचार रहित व्यवस्था की एक महत्वपूर्ण लड़ाई लड़ रहे हैं। क्या वाकई लोकपाल विधेयक इस मंशा को पूरा कर सकेगा?
मुझे पूरा यकीन है कि लोकपाल विधेयक भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था का निर्माण कर सकेगा। लोकपाल विधेयक में भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कदम उठाने की अनुशंसा की गई है। उसमें कहा गया है कि भ्रष्टाचार संबंधी शिकायत पर सबसे पहले संबंघित व्यक्ति को जेल भेज देना चाहिए बाद में तहकीकात की जाए। बडे भ्रष्टाचार में संबंघित व्यक्ति के अलावा परिवार के सभी सदस्यों की संपत्ति जब्त कर नीलाम कर देनी चाहिए। ए राजा जैसे लोगों को सीधा फांसी पर लटका देना चाहिए। लेकिन सवाल ये है कि यह सब सरकार के मुश्किल से गले उतर रहा है। 

मुसीबत में ऎसी कौनसी ताकत है जो आपको हमेशा आगे बढ़ने का हौसला देती रही?
पिछले 35 साल से संघर्ष कर रहा हूं। कोई है जो मेरे पीछे खड़ा मुझे आगे बढ़ने की प्रेरणा दे रहा है। ईश्वर पर मुझे पूरा भरोसा है, जब जिंदगी का मकसद त्याग, बलिदान और शुद्ध आचरण हो जाए तो ईश्वर भी आपके साथ खड़ा होता है। इस बात का एहसास मुझे होता रहा है।

समाज के लिए कुछ कर गुजरने की प्रेरणा आपको कैसे मिली?
मेरी उम्र करीब 26 साल की रही होगी, उन दिनों मेरी पोस्टिंग पंजाब से सटे खेमकरन में लगी हुई थी। लड़ाई में मेरे सारे साथी मारे गए, मुझे मामूली चोटें आइंü। मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर मानव जीवन का अर्थ क्या है, लेकिन लाख कोशिश के बाद भी मुझे इस सवाल का जवाब नहीं मिला। मैंने आत्महत्या करने का मन बना लिया। 

लेकिन ठीक उन्हीं दिनों मुझे विवेकानंद की किताब 'कॉल टु दि यूथ फॉर नेशन' मिली, वो किताब मेरे जीवन के लिए टर्निंग पॉइंट साबित हुई। मुझे जीवन का मकसद मिल गया कि समाजसेवा में ही जीवन का असली सुख है। और सच कहूं तो बड़े-बड़े उद्योगपतियों को ऎसा आनंद नहीं मिलता होगा जो मुझे लोगों का दर्द बांटने में मिलता है।

सुना है आप हर महीने अपनी  पेशन गांवों के विकास फंड में जमा कर देते हैं। तब आपका खर्च  कैसे चलता है?
मेरा अपना कोई खर्च नहीं है। बस एक वक्त का खाना और दो जोड़ी कपड़े। बच्चों के लिए चल रहे हॉस्टल से खाना मिल जाता है। 8 बाई 10 का एक कमरा है जिसके कोने में एक बिस्तर लगा हुआ है। हर महीने 6 हजार रूपए पेंशन आती है। वो किसी न किसी दीन दुखी की मदद में काम आ जाती है। अभी तक मुझे 25 लाख रूपए  नकद इनाम के रूप में मिल चुके हंै जिनसे हर महीने ब्याज आता है। उस ब्याज से हर साल किसी गरीब की बेटी की शादी हो जाती है।  

आर्मी का अनुशासन आपके जीवन में आज भी कायम है?
बिलकुल, आर्मी की लाइफ ने मुझे मेरा मकसद पूरा करने में बड़ी मदद की। अनुशासन ही था जिसके बूते रालेगन सिद्धी जैसे गांव की तस्वीर बदल सका। उस गांव में  80 फीसदी लोग भुखमरी में जीवन गुजार रहे थे। 40 शराब के ठेके थे। लेकिन आज वहां न तो एक शराब का ठेका है और न ही पूरे गांव में पान, गुटका, बीड़ी का कोई सेवन करता है। 

फिल्में देखना पसंद करते हैं?
आर्मी में जाने से पहले मुझे फिल्मों का शौक था। मैं 50 साल पहले की बात कर रहा हूं। लेकिन उसके बाद तो फिल्मों के नाम तक पता नहीं हैं। 

आपने जीवनभर अविवाहित रहने का फैसला क्यों किया ?
 मुझे अपने फैसले पर कोई पछतावा नहीं है बल्कि मुझे खुशी है कि मेरा परिवार इतना बड़ा है कि वहां मैं और मेरा जैसे शब्दों के लिए कोई जगह नहीं है। छोटा परिवार दुख देता है, जबकि बड़ा परिवार आनंद। 
पद्मभूषण और पद्श्री जैसे सम्मान आपके जीवन में कितने मायने रखते हैं।  
मैंने कोई भी काम सम्मान पाने के लिए नहीं किया और न ही मेरा जीवन में इनका कोई मतलब है। मैंने अपने लेटर हेड पर किसी सम्मान का जिक्र  नहीं किया।

अन्ना की जिंदगीसंघर्षो की दास्तां
अन्ना की शख्सियत बडे अनगढ़ तरीके से गढ़ी हुई है। 15 जून 1938 को महाराष्ट्र के अहमद नगर के भिंगर कस्बे में जन्मे अन्ना का बचपन बहुत गरीबी में गुजरा। पिता मजदूर थे। दादा फौज में। 

दादा की पोस्टिंग भिंगनगर में थी। वैसे अन्ना के पुरखों का गांव अहमद नगर जिले में ही स्थित रालेगन सिद्धि में था। दादा की मौत के सात साल बाद अन्ना का परिवार रालेगन आ गया। अन्ना के छह भाई हैं। परिवार में तंगी का आलम देखकर अन्ना की बुआ उन्हें मुम्बई ले गईं। वहां उन्होंने सातवीं तक पढ़ाई की। परिवार पर कष्टों का बोझ देखकर वह दादर स्टेशन के बाहर एक फूल बेचनेवाले की दुकान में 40 रूपए की पगार में काम करने लगे। इसके बाद उन्होंने फूलों की अपनी दुकान खोल ली और अपने दो भाइयों को भी रालेगन से बुला लिया। छठे दशक के आसपास वह फौज में शामिल हो गए। उनकी पहली पोस्टिंग बतौर ड्राइवर पंजाब में हुई। 

यहीं पाकिस्तानी हमले में वह मौत को धता बता कर बचे थे। इसी दौरान नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से उन्होंने विवेकानंद की एक बुक को पढ़ने के बाद उन्होंने अपनी जिंदगी समाज को समर्पित कर दी। उन्होंने गांधी और विनोबा को भी पढ़ा। 1970 में उन्होंने आजीवन अविवाहित रहने का संकल्प किया। मुम्बई पोस्टिंग के दौरान वह अपने गांव रालेगन आते-जाते रहे। चट्टान पर बैठकर गांव को सुधारने की बात सोचते रहते। जम्मू पोस्टिंग के दौरान 15 साल फौज में पूरे होने पर 1975 में उन्होंने वीआरएस ले लिया और गांव में आकर डट गए।

20.4.11

क्या इन टोटको से भर्ष्टाचार खत्म हो सकता है ?

क्या  इन टोटको से भर्ष्टाचार खत्म हो सकता है ?
भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में अपनी जान को दांव पर लगा देने वाले बुजुर्ग समाजसेवी अन्ना हजारे की तारीफों से आजकल मीडिया का हर कोना भरा हुआ है। नवभारत टाइम्स के इस ब्लॉग पर भी कई साथी ब्लॉगर (ताजा उदाहरण है रमाशंकर सिंह के ब्लॉग बतंगड़ की नई पोस्ट) यह काम कर चुके हैं। ठीक भी है। आखिर अन्ना कोई निजी लड़ाई तो लड़ नहीं रहे। भ्रष्टाचार से देश की बहुत बड़ी आबादी पीड़ित है और इन सबकी तरफ से पहलकदमी करते हुए अन्ना ने अगर आमरण अनशन का संकल्प कर लिया है तो यह कोई छोटी बात नहीं। हर संभव तरीके से अन्ना की इस मुहिम को न केवल समर्थन देना चाहिए बल्कि और मजबूत बनाते हुए इसे इसकी तार्किक परिणति तक पहुंचाने की कोशिश करनी चाहिए।
मगर सवाल यह है कि इसे मजबूत बनाने के क्या तरीके हो सकते हैं। एक तो यह कि इसकी तारीफ करते हुए शब्दों का पहाड़ खड़ा कर दिया जाए। आम तौर पर पूरा मीडिया यह काम कर ही रहा है। दूसरा तरीका यह है कि सांकेतिक और क्रमिक अनशन, रैली, मोमबत्ती मार्च आदि कार्यक्रमों के जरिए अन्ना की मुहिम को समर्थन दिया जाए। यह काम भी देश के तमाम हिस्सों में हो रहा है। इसके अलावा एक और तरीका है अन्ना की इस मुहिम को मजबूती देने का। वह है इस मुहिम के वैचारिक पक्षों की पड़ताल करते हुए इसकी कमजोरियों को रेखांकित किया जाए ताकि उसे दूर कर इस मुहिम को ज्यादा कारगर बनाया जा सके।

सच पूछें तो यह सबसे जरूरी काम है जो इस मुहिम के शुभचिंतकों को करना चाहिए। लेकिन, यही काम ढंग से होता नहीं दिख रहा। मुहिम का शोर तो बहुत हो रहा है, लेकिन इसे ज्यादा मजबूत, ज्यादा कारगर, ज्यादा तर्कसंगत बनाने की कोशिश कम से कम सार्वजनिक मंचों पर अपवादस्वरूप ही दिख रही है। चूंकि अन्ना हजारे का कोई निजी स्वार्थ नहीं है और सार्वजनिक कल्याण के भाव से सबके हित को देखते हुए उन्होंने यह मुहिम शुरू की है, इसलिए निश्चित तौर पर खुद अन्ना भी ऐसी किसी कोशिश का समर्थन ही करेंगे। मगर, यही बात उनके उन उत्साही समर्थकों के बारे में नहीं कही जा सकती, जो इस मुहिम का शोर मचाते हुए इसके लिए जीने-मरने का खोखला एलान करने को ही सफलता की गारंटी समझ बैठे हैं। बहुत संभव है कि ऐसी किसी कोशिश को ये उत्साही समर्थक मुहिम के विरोध के रूप में लें और ऐसा करने वालों को विरोधी खेमे का करार दें। यह भी एक वजह हो सकती है ऐसी किसी कोशिश के सामने न आने की।

मगर, यह जरूरी है। खासकर इसलिए भी कि अगर इस मुहिम के वैचारिक पक्ष की कमजोरियों पर एक नजर डालें तो साफ हो जाता है कि यह मुहिम अपने मौजूदा स्वरूप में दुश्मन का (अगर दुश्मन किसी खास व्यक्ति को नहीं बल्कि भ्रष्टाचार की सर्वव्यापी प्रवृत्ति को माना जाए) कुछ खास नहीं बिगाड़ सकती। अधिक से अधिक यह देश भर में भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष का माहौल बना सकती है लेकिन वह भी बहुत थोड़ी देर के लिए। अगर इस मुहिम ने अपने रंग-रूप और चरित्र में बड़े बदलाव नहीं किए तो प्रबल संभावना यही है कि कुछ ही दिनों में यह मुहिम देशवासियों के मन में जीत का झूठा एहसास दिलाते हुए समाप्त हो जाए। और अगर ऐसा होता है तो इसके लिए जिम्मेदार सरकार और विपक्ष में बैठी वे ताकतें नहीं होंगी जो रूप बदलने की कला में माहिर हैं और ज्यादातर मामलों में दुश्मन के ही वेश में दुश्मन के सामने जाती हैं ताकि लड़ाई के निर्णायक पलों में दुश्मन को अपने समर्थकों से खास मदद न मिल सके। इसके लिए जिम्मेदार होंगे वे लोग जो इस मुहिम के समर्थक हैं, इसे कामयाब बनाना चाहते हैं, लेकिन इसे मजबूत और कारगर बनाने की कोशिश नहीं कर रहे, यह सोचकर कि कहीं उन्हें विरोधी न मान लिया जाए।

बहरहाल, बात मुहिम की कमजोरियों की हो रही थी। इस मुहिम की सबसे बड़ी ताकत अगर अन्ना की निष्पक्ष और ईमानदार छवि है तो इसकी सबसे बड़ी कमजोरी इसका अराजनीतिक चरित्र है। ध्यान दें कि राजनीति का मतलब किसी खास दल से जुड़ाव ही नहीं है। अगर यह आंदोलन मौजूदा सभी राजनीतिक दलों को खारिज करता है और खुद को उन सबसे अलग रखता है तो यह बहुत अच्छी बात है। लेकिन, अगर यह राजनीति मात्र को अपने एजेंडे से बाहर रखता है तो इसका मतलब यह जाने-अनजाने खुद को और लोगों को भुलावे में रख रहा है। यही इस आंदोलन का सबसे कमजोर बिंदु है और इसी वजह से इसका पिटना करीब-करीब तय है।

आप देखिए कि अन्ना कैसे-कैसे बयान दे रहे हैं? शरद पवार भ्रष्ट हैं। भ्रष्टाचार पर बनी जीओएम (मंत्रिसमूह) में फला-फलां और फलां मंत्री हैं। इसलिए इस समिति का कोई भविष्य नहीं है। पवार को तो मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे देना चाहिए।

पवार का बचाव करने की कोई जरूरत नहीं है। अगर पवार के मंत्रिमंडल से बाहर हो जाने से भ्रष्टाचार के राक्षस का खात्मा हो जाता है तो उन्हें कल नहीं आज कैबिनेट से निकाल फेंकना चाहिए। लेकिन क्या समस्या इतनी सरल है? क्या पवार को हटा देने से भ्रष्टाचार मिट जाएगा? कृपया यह न कहें कि कम से कम एक शुरुआत तो होगी। अन्ना ने अपनी जिंदगी शुरुआत के लिए दांव पर नहीं लगाई है, खात्मे के लिए लगाई है। हमारा मकसद भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई की शुरुआत करना नहीं, बल्कि उस लड़ाई का निर्णायक और पॉजिटिव अंत करना है। क्या किसी पवार, किसी मोइली, किसी सिब्बल के कैबिनेट से हट जाने से यह मकसद हासिल हो जाएगा? कहने को तो कांग्रेस भी कह रही है कि उसने ए. राजा को कैबिनेट से हटाकर जेल तक पहुंचा दिया और इस प्रकार भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई को आगे बढ़ाया है। क्या उसके इस दावे को स्वीकार किया जा सकता है?

क्या इन टोटको से भर्ष्टाचार खत्म हो सकता है ? आप देखिए कि अन्ना कैसे-कैसे बयान दे रहे हैं? शरद पवार भ्रष्ट हैं। भ्रष्टाचार पर बनी जीओएम (मंत्रिसमूह) में फला-फलां और फलां मंत्री हैं। इसलिए इस समिति का कोई भविष्य नहीं है। पवार को तो मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे देना चाहिए। पवार का बचाव करने की कोई जरूरत नहीं है। अगर पवार के मंत्रिमंडल से बाहर हो जाने से भ्रष्टाचार