18.10.11

नवभारत टाइम्स पर भी "सिरफिरा-आजाद पंछी"

नवभारत टाइम्स पर पत्रकार रमेश कुमार जैन का ब्लॉग क्लिक करके देखें "सिरफिरा-आजाद पंछी" (प्रचार सामग्री)
क्या पत्रकार केवल समाचार बेचने वाला है? नहीं.वह सिर भी बेचता है और संघर्ष भी करता है.उसके जिम्मे कर्त्तव्य लगाया गया है कि-वह अत्याचारी के अत्याचारों के विरुध्द आवाज उठाये.एक सच्चे और ईमानदार पत्रकार का कर्त्तव्य हैं,प्रजा के दुःख दूर करना,सरकार के अन्याय के विरुध्द आवाज उठाना,उसे सही परामर्श देना और वह न माने तो उसके विरुध्द संघर्ष करना. वह यह कर्त्तव्य नहीं निभाता है तो वह भी आम दुकानों की तरह एक दुकान है किसी ने सब्जी बेचली और किसी ने खबर.        
अगर आपके पास समय हो तो नवभारत टाइम्स पर निर्मित हमारे ब्लॉग पर अब तक प्रकाशित निम्नलिखित पोस्टों की लिंक को क्लिक करके पढ़ें. अगर टिप्पणी का समय न हो तो वहां पर वोट जरुर दें. हमसे क्लिक करके मिलिए : गूगल, ऑरकुट और फेसबुक पर 

अभी तो अजन्मा बच्चा हूँ दोस्तो
घरेलू हिंसा अधिनियम का अन्याय
घरेलू हिंसा अधिनियम का अन्याय-2
स्वयं गुड़ खाकर, गुड़ न खाने की शिक्षा नहीं देता हूं
अब आरोपित को ऍफ़ आई आर की प्रति मिलेगी
यह हमारे देश में कैसा कानून है?
नसीबों वाले हैं, जिनके है बेटियाँ
देशवासियों/पाठकों/ब्लॉगरों के नाम संदेश
आलोचना करने पर ईनाम?
जब पड़ जाए दिल का दौरा!"शकुन्तला प्रेस" का व्यक्तिगत "पुस्तकालय" क्यों?
आओ दोस्तों हिन्दी-हिन्दी का खेल खेलें
हिंदी की टाइपिंग कैसे करें?
हिंदी में ईमेल कैसे भेजें
आज सभी हिंदी ब्लॉगर भाई यह शपथ लें
अपना ब्लॉग क्यों और कैसे बनाये
क्या मैंने कोई अपराध किया है?इस समूह में आपका स्वागत है
एक हिंदी प्रेमी की नाराजगी
भगवान महावीर की शरण में हूँ
क्या यह निजी प्रचार का विज्ञापन है?
आप भी अपने मित्रों को बधाई भेजें
हमें अपना फर्ज निभाना है
क्या ब्लॉगर मेरी मदद कर सकते हैं ?
कटोरा और भीख
भारत माता फिर मांग रही क़ुर्बानी
क्लिक करें, ब्लॉग पढ़ें :-मेरा-नवभारत टाइम्स पर ब्लॉग,   "सिरफिरा-आजाद पंछी", "रमेश कुमार सिरफिरा", सच्चा दोस्त, आपकी शायरी, मुबारकबाद, आपको मुबारक हो, शकुन्तला प्रेस ऑफ इंडिया प्रकाशन, सच का सामना(आत्मकथा), तीर्थंकर महावीर स्वामी जी, शकुन्तला प्रेस का पुस्तकालय और (जिनपर कार्य चल रहा है) शकुन्तला महिला कल्याण कोष, मानव सेवा एकता मंच एवं  चुनाव चिन्ह पर आधरित कैमरा-तीसरी आँख

16.10.11

मौत की आग़ोश में जब थक के सो जाती है माँ

Please See Bloggers' Meet Weekly 13

'माँ' The mother Part 1 


यह एक विशेष भेंट है जो कि हम अपने पाठकों की नज़्र कर रहे हैं।
उम्मीद है कि यह भेंट आप सभी भाई बहनों को ज़रूर पसंद आएगी।

मौत की आग़ोश में जब थक के सो जाती है माँ
तब कहीं जाकर ‘रज़ा‘ थोड़ा सुकूं पाती है माँ
 

कुछ सवाल : आप दीजिये जवाब (Some Questions for All Bloggers)


दिनाँक - 10 सितंबर 2011

ब्लॉग का नाम - हिन्दी ब्लौगर्स फोरम इंटरनेशनल 

विषय - हिन्दी ब्लॉगिंग गाइड 

कड़ी - 33

उप विषय - साझा ब्लॉग कैसे बनाएँ ?

पोस्ट पाठक संख्या - 13 

टिप्पणी या प्रतिक्रिया - 0 (शून्य)

              और

लेखक - महेश बारमाटे "माही"


जी हाँ !
मैं वही महेश बारमाटे हूँ, जिसे शायद आप लोग "माही" के नाम से जानते हैं, और हिन्दी ब्लॉगिंग गाइड को अगर अनवर जमाल जी के नाम से जाना जाता है, तो कहीं न कहीं मेरा ज़िक्र भी आपके जेहन मे जरूर आता होगा, ऐसा मेरा मानना है। 
आज मैं हिन्दी ब्लॉगिंग गाइड के प्रचार के सिलसिले में खुद को श्रेय दिलवाने के लिए नहीं वरन आप सबसे कुछ  सवाल पूछने आया हूँ।  (बल्कि मेरा विचार ऐसा कभी नहीं रहा कि हिन्दी ब्लॉगिंग गाइड के लिए मुझे कोई श्रेय मिले, क्योंकि यह मेरी किताब नहीं है, यह हर ब्लॉगर की किताब है)

मैंने जब हिन्दी ब्लॉगिंग जगत में कदम रखा था तो आपकी ही तरह ब्लॉगिंग के नियमों, लेखन की सीमाओं और तकनीकी ज्ञान से अनभिज्ञ था। मुझे तो बस इतना पता था कि कुछ तो ऐसा किया जाये, जो इतिहास के पन्नों मे न सही पर किसी न किसी के तो दिल को कम से कम एक बार छू जाये। और इसी प्रयास में मैंने अपनी कविताओं से ब्लॉगिंग की शुरुआत की, समय गुजरता गया और काफी कुछ मैं सीखता चला गया। और तब सोचा कि जिस तरह मैं जब नया था तो मुझे कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ा था तो इस देश में लाखों करोड़ों ऐसे लोग होंगे जो लिखना तो जानते हैं, और अपनी बात लोगों तक पहुंचाना भी चाहते हैं पर ब्लॉगिंग की जानकारी के अभाव में बस खुद तक या अपने दोस्तों तक ही सीमित रह जाते हैं। तो फिर क्यों न ऐसे लोगों को ब्लॉगिंग सिखायी जाये। और इस हेतु मैंने कुछ लेख लिखे जिससे डॉ० अनवर जमाल खान जी सहमत हुये और उन्होने मुझे हिन्दी ब्लॉगिंग के उस ऐतिहासिक कदम का न केवल हिस्सा बनाया बल्कि इस कदम का आगाज करने को भी मुझे ही कहा जिसे आज आप लोग हिन्दी ब्लॉगिंग गाइड के नाम से जानते हैं। 
आज मैं अनवर जी का बहुत आभारी हूँ जो उन्होने मुझे इस मुकाम तक पहुँचने में मदद की जहाँ मैं अपनी सोच को साकार होता देख रहा हूँ। 
पर मैं जानना चाहता हूँ कि 

  • आखिर मेरी ऐसी क्या खता थी, क्या गलती थी जिसकी मुझे सजा मिली ?
  • आखिर क्या कोई नहीं चाहता कि नए ब्लॉगर अपना खुद का साझा ब्लॉग बना सकें? 
  • क्या मेरी पोस्ट में ऐसा कुछ मैंने लिखा था जो "Not For Bloggers" था ?
  • क्यों मेरी पोस्ट को 13 लोगों ने देख के भी अनदेखा कर दिया? 
  • क्या पूरे ब्लॉग जगत मे बस 13 ब्लॉगर ही हैं, जो हिन्दी ब्लॉगिंग गाइड से संबन्धित लेख पढ़ना पसंद करते है ? 
  • और क्यों बाकी लोगों ने इसे देखना भी न चाहा ?
  • अगर ऐसा था तो आप लोग मेरी पोस्ट पे आए ही क्यों ? कम से कम दिल को तसल्ली तो होती कि जब किसी ने देखा ही नहीं, तो उस पे प्रतिक्रिया मिलना तो उस सोच से भी परे है जिसके पार एक कवि भी नहीं जा सकता। 

आज मैं आप सभी से अपने इन सवालों का जवाब चाहता हूँ कि मेरी पोस्ट को नकारा क्यों गया ?

मैं कोई ऐसा ब्लॉगर भी नहीं हूँ जिसे नकारा जा सके, अगर ऐसा होता तो मेरी कविताओं पे आपकी तालियों की गूंज दिखाई न देती, मेरे लेखों पे, मेरे नए प्रयासों पे आप लोगों की सहमति, आप लोगों की शाबासी भी न मिलती मुझको। 

आज मुझे आपका जवाब चाहिए ही चाहिए... 

क्या ? आप चाहते हैं कि मेरा वो लेख फिर से पढ़ के देखने के बाद ही आप मुझे जवाब देंगे ?
तो फिर ठीक है... 

ये लीजिये लिंक - 


फिर मत कहना कि मैंने लिंक भी नहीं दिया और बहुत कुछ बुरा - भला सुना दिया आप लोगों को... 

नोट - आप सभी से अनुरोध है कि आपके मन में आए जवाब हिन्दी ब्लॉगिंग की गरिमा का ध्यान रखते हुये ही मुझे दें, बेनामी जवाब दे के अपनी पहचान छुपाना एक गरिमामय ब्लॉगर के लक्षण नहीं हैं... 

धन्यवाद ! 


आपके जवाबों के इंतज़ार में... 

- महेश बारमाटे "माही"

15.10.11

...तो ये आपके देशभक्‍त हैं!

...तो भाजपा का मानना है कि चाहे डीआईजी डी जी वंज़ारा हों ....या फिर डिप्टी पुलीस कमिश्नर अभय चुडासामा या फिर अमित शाह खुद ...ये सब देश भक्त हैं जिन्हें सोहराबुद्दीन नाम के आतंकवादी को मारने की सज़ा कांग्रेस दे रही है.

जाहिर है, कि एक शख्स जिसके पास इतनी तादाद में असला ओर गोलियां मिलें वो आंतकवादी ही तो होगा ...हालांकि ये दलील अपने आप में कितनी हास्यास्‍पद है, ये बात क्राईम और आतंकवाद जानने वाले लोग आपको बता देंगे.

मगर मैं सोहराबुद्दीन का महिमामंडन नहीं करना चाहता. अंग्रेजी मे कहावत हैं, '...दोज़ हू लिव बाए द गन डाई बाए द गन,' यानी जो बंदूक और हिंसा से सनी जिंदगी जीते हैं वो वैसी ही मौत मरते हैं. सोहराबुद्दीन एक हिस्ट्रीशीटर था ..एक एक्सटोरशनिस्ट था ..लिहाजा आज नहीं तो कल ...ये उसका हश्र जरूर होता. मगर सवाल ये कि क्या उसको मारने वाले देश भक्त हैं.

गौर कीजिए ....पॉप्‍यूलर बिल्डर्स के प्रमोटर रमन पटेल ने कहा है कि उन्‍होंने अमित शाह के खास अजय पटेल को वसूली के तहत सत्तर लाख रुपए दिए थे. और ये पैसे देने के लिए भाजपा के देशभक्त पुलिस अफसर वंजारा ने धमकाया था. पैसे देने के बाद खुद अमित शाह ने उन्हें कॉल किया था.

वंजारा पर ये पहला इल्जाम नहीं है वसूली का ...इससे पहले भी ये इल्जाम लगते रहे हैं कि वो बाकायदा अमित शाह और खुद अपने स्तर पर लोगों से वसूली करते रहे हैं.

अब गौर कीजिए देश भक्त नम्बर दो ..अभय चुडासामा पर. ..इन्हें भी अमित शाह की शह हासिल थी और ये न सिर्फ एक्सटोर्शन में माहिर थे, बल्कि इन्हें फिक्सर कहा जाता है, और लोगों की पोस्टिग कराने का भी भरपूर तजुर्बा हासिल है इन्हें. यही इल्जाम एसपी दिनेश एमएन पर है जिनपर राज्य के संगमरमर व्यापारियों ने जबरन वसूली का आरोप लगाया है. तो ये वो तमाम महानुभव हैं जिन्होंने सोहराबुद्दीन को जन्नत या जहन्नुम का रास्ता दिखाया और अब ये लोग भाजपा के देशभक्त हैं.

मैं नहीं जानता कि देशभक्त होने का ये कौनसा पैमाना है ...मगर ये बात तय है कि सोहराबुद्दीन की मौत इसलिए नहीं हुई क्योंकि वो देश का दुश्मन या फिर 'एनेमी ऑफ दी स्टेट' था ....बल्कि उसकी मौत के पीछे सिर्फ और सिर्फ पैसा था और कुछ नहीं.

कांग्रेस अपनी आदत से मजबूर है. वो मामले को मुस्लिम रंग देने की कोशिश कर रही है और इस बात में दो राय नहीं कि सीबीआई का अचानक इस मामले में हरकत में आ जाना बिहार की राजनीति से जुड़ा है. यानी इस मामले के दो पहलू साफ हैं. कांग्रेस का शर्मनाक माईनोरिटी कार्ड और भाजपा का हास्यास्‍पद देशभक्ति कार्ड. दोनों ही महान और अब मतदाता को सोचना है कि वो किस पर मोहर लगाए.

मगर माफ कीजिएगा...न ये देशभक्ति और न ही सोहराबुद्दीन का मामला मुसलमान उत्पीड़न से जुड़ा हुआ है. चलिए राजनीति के इस वाहियात खेल में हम सब शरीक हैं ....और ये आगे क्या रंग दिखाएगा ..उसकी भविष्यवाणी करने के लिए भी आपको सियासत का दिग्गज जानकार होने की ज़रूरत भी नहीं है.

(अभिसार शर्मा आज तक न्‍यूज चैनल में डिप्‍टी एडीटर हैं. उपरोक्‍त आलेख इनके निजी विचार हैं.)


...तो ये आपके देशभक्‍त हैं!

...तो भाजपा का मानना है कि चाहे डीआईजी डी जी वंज़ारा हों ....या फिर डिप्टी पुलीस कमिश्नर अभय चुडासामा या फिर अमित शाह खुद ...ये सब देश भक्त हैं जिन्हें सोहराबुद्दीन नाम के आतंकवादी को मारने की सज़ा कांग्रेस दे रही है.

जाहिर है, कि एक शख्स जिसके पास इतनी तादाद में असला ओर गोलियां मिलें वो आंतकवादी ही तो होगा ...हालांकि ये दलील अपने आप में कितनी हास्यास्‍पद है, ये बात क्राईम और आतंकवाद जानने वाले लोग आपको बता देंगे.

मगर मैं सोहराबुद्दीन का महिमामंडन नहीं करना चाहता. अंग्रेजी मे कहावत हैं, '...दोज़ हू लिव बाए द गन डाई बाए द गन,' यानी जो बंदूक और हिंसा से सनी जिंदगी जीते हैं वो वैसी ही मौत मरते हैं. सोहराबुद्दीन एक हिस्ट्रीशीटर था ..एक एक्सटोरशनिस्ट था ..लिहाजा आज नहीं तो कल ...ये उसका हश्र जरूर होता. मगर सवाल ये कि क्या उसको मारने वाले देश भक्त हैं.

गौर कीजिए ....पॉप्‍यूलर बिल्डर्स के प्रमोटर रमन पटेल ने कहा है कि उन्‍होंने अमित शाह के खास अजय पटेल को वसूली के तहत सत्तर लाख रुपए दिए थे. और ये पैसे देने के लिए भाजपा के देशभक्त पुलिस अफसर वंजारा ने धमकाया था. पैसे देने के बाद खुद अमित शाह ने उन्हें कॉल किया था.

वंजारा पर ये पहला इल्जाम नहीं है वसूली का ...इससे पहले भी ये इल्जाम लगते रहे हैं कि वो बाकायदा अमित शाह और खुद अपने स्तर पर लोगों से वसूली करते रहे हैं.

अब गौर कीजिए देश भक्त नम्बर दो ..अभय चुडासामा पर. ..इन्हें भी अमित शाह की शह हासिल थी और ये न सिर्फ एक्सटोर्शन में माहिर थे, बल्कि इन्हें फिक्सर कहा जाता है, और लोगों की पोस्टिग कराने का भी भरपूर तजुर्बा हासिल है इन्हें. यही इल्जाम एसपी दिनेश एमएन पर है जिनपर राज्य के संगमरमर व्यापारियों ने जबरन वसूली का आरोप लगाया है. तो ये वो तमाम महानुभव हैं जिन्होंने सोहराबुद्दीन को जन्नत या जहन्नुम का रास्ता दिखाया और अब ये लोग भाजपा के देशभक्त हैं.

मैं नहीं जानता कि देशभक्त होने का ये कौनसा पैमाना है ...मगर ये बात तय है कि सोहराबुद्दीन की मौत इसलिए नहीं हुई क्योंकि वो देश का दुश्मन या फिर 'एनेमी ऑफ दी स्टेट' था ....बल्कि उसकी मौत के पीछे सिर्फ और सिर्फ पैसा था और कुछ नहीं.

कांग्रेस अपनी आदत से मजबूर है. वो मामले को मुस्लिम रंग देने की कोशिश कर रही है और इस बात में दो राय नहीं कि सीबीआई का अचानक इस मामले में हरकत में आ जाना बिहार की राजनीति से जुड़ा है. यानी इस मामले के दो पहलू साफ हैं. कांग्रेस का शर्मनाक माईनोरिटी कार्ड और भाजपा का हास्यास्‍पद देशभक्ति कार्ड. दोनों ही महान और अब मतदाता को सोचना है कि वो किस पर मोहर लगाए.

मगर माफ कीजिएगा...न ये देशभक्ति और न ही सोहराबुद्दीन का मामला मुसलमान उत्पीड़न से जुड़ा हुआ है. चलिए राजनीति के इस वाहियात खेल में हम सब शरीक हैं ....और ये आगे क्या रंग दिखाएगा ..उसकी भविष्यवाणी करने के लिए भी आपको सियासत का दिग्गज जानकार होने की ज़रूरत भी नहीं है.

(अभिसार शर्मा आज तक न्‍यूज चैनल में डिप्‍टी एडीटर हैं. उपरोक्‍त आलेख इनके निजी विचार हैं.)


बाल विवाह रोकने की कोशिश


बाल विवाह रोकने की कोशिश

शकुंतला वर्मा नाम की महिला सामाजिक कार्यकर्ता का एक हाथ काटे जाने और दूसरे हाथ को बुरी तरह जख़्मी किए जाने की घटना के बाद पूरे इलाक़े में सनसनी फैल गई है.

राज्य के अधिकारियों का कहना है कि वे भांगरा गाँव में बाल विवाह रोकने की कोशिश कर रही थीं तभी लोगों ने उनके ऊपर हमला कर दिया.

भारत में बाल विवाह ग़ैर-क़ानूनी है और दंडनीय अपराध है लेकिन ग्रामीण इलाक़ों में अब भी बदस्तूर जारी है.

बुधवार को भारत में आखा तीज का दिन था, इस दिन भारत के कई हिस्सों में बाल विवाह बड़े पैमाने पर आयोजित किए जाते हैं.

मध्य प्रदेश के वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी पी आहूजा का कहना है कि गाँव के लोग बाल विवाह के बारे में शकुंतला वर्मा की टिप्पणियों से बहुत बुरी तरह से नाराज़ हो गए थे इसलिए यह हमला हुआ होगा.

शकुंतला वर्मा पिछले चार दिनों से इस गाँव में बाल विवाह के विरोध में प्रचार कर रही थीं.

मुख्यमंत्री

राज्य के मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर यह मानने को तैयार नहीं है कि इस हमले का बाल विवाह से कोई सीधा संबंध नहीं है. उन्होंने कहा कि बाल विवाह रोकना सरकार के लिए संभव नहीं है.

उन्होंने कहा, "बाल विवाह को रोकना संभव नहीं है, क्या नशाख़ोरी और अस्पृश्यता को रोक पाना संभव हो पाया है, गाँधी जी जब यह सब नहीं रोक पाए तो बाबूलाल गौर कैसे रोक सकता है? "

स्थानीय पुलिस अधिकारी आर एन बोरना ने समाचार एजेंसी एएफ़पी को बताया है कि हमला एक बालिका वधू के भाई ने किया था.

शकुंतला वर्मा का इलाज एक स्थानीय अस्पताल में चल रहा है और वे ख़तरे से बाहर बताई जाती हैं.

14.10.11

सिरफिरा-आजाद पंछी: दोस्ती को बदनाम करती लड़कियों से सावधान रहे.

सिरफिरा-आजाद पंछी: दोस्ती को बदनाम करती लड़कियों से सावधान रहे.: यह दोस्ती हम नहीं छोड़ेंगे... प्रिय पाठकों, आज दोस्ती के मायने बदल चुके हैं. आप दोस्ती जैसे पवित्र नाम को बदनाम करती लड़कियों से सावधा...

माही फ्रेंड अन्ना हजारे!

कहते हैं कि देश में अगर अन्ना का कोई सबसे बड़ा समर्थक है, तो वो है महेंद्र सिंह धोनी. वो उनकी तारीफ़ करते नहीं थकते. दरअसल अन्ना ने बुरे वक्त में धोनी का काफी साथ दिया है. बहुत अहसान है अन्ना का माही पर. अरे-अरे, मेरी बातों को ज़्यादा सीरियसली मत लीजिएगा. अब ये इत्तेफ़ाक ही कुछ ऐसा है कि आजकल हर कोई यही मज़ाक कर रहा है.


ऐसा नहीं है कि ये रिश्ता एकतरफ़ा है. दिमाग पर ज़ोर लगाकर याद कीजिए कि आपको जनलोकपाल बिल और अन्ना के बारे में सबसे पहले कब पता चला? वर्ल्डकप के बाद ना? मैंने विश्वकप के दौरान जितने भी मैच कवर किए, छोटे-छोटे झुंड में लोग 'इंडिया अगेंस्ट करप्‍शन' के प्लेकार्ड्स लिए स्टेडियम के बाहर नारेबाज़ी करते थे. मीडिया से समर्थन की गुहार भी लगाते थे, पर उस वक्त क्रिकेट का खुमार कुछ ऐसा था कि हम चाहकर भी उन्हें कवरेज नहीं दे पाए.

खैर, वर्ल्डकप खत्म हुआ, माही के सिर पर ताज सजा. और फिर 30 साल के विश्वविजेता से ध्यान 74 साल के उस शख्स पर जा टिका, जो देश से भ्रष्टाचार भगाना चाहता था.

क्रिकेट से सशक्त हुए देश के युवा लामबंद हुए, जाग्रत हुए और वहीं से अन्ना और माही का एक अजीब-सा रिश्ता शुरू हुआ. जब क्रिकेट नहीं होता, अन्ना का आंदोलन ज़ोर पकड़ता. और जब क्रिकेट टीम का निराशाजनक प्रदर्शन होता, तो अन्ना की आंधी में सबकुछ छुप जाता.

रामलीला मैदान में लहराते तिरंगे वैसे भी किसी क्रिकेट मैदान की ही याद दिलाते हैं, नहीं तो बाकी जगह राजनीतिक पार्टियों के झंडे ही होते हैं, देशभक्ति नहीं.

माही ने प्रेस कॉन्फ़्रेंस में तो अन्ना पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया, पर भीतर ही भीतर टीम इंडिया में सब अन्ना से प्रभावित हैं. काश, इस मुश्किल दौर में भारतीय क्रिकेट को भी एक अन्ना मिल जाता!


6.10.11

तब क्यों छुड़वाया था पाक यात्रियों को आडवानी ने?


हाल ही भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश उपाध्यक्ष तथा पूर्व सांसद औंकार सिंह लखावत व जिलाध्यक्ष व पूर्व सांसद रासासिंह रावत सहित विधायक द्वय प्रो. वासुदेव देवनानी व श्रीमती अनिता भदेल ने अजमेर में बिना अनुमति के पाकिस्तान के वाणिज्य मंत्री के सभा करने पर कड़ा ऐतराज करते हुए दोषियों के विरुद्ध कड़ी कार्यवाही के साथ केन्द्रीय गृहमंत्री पी. चिदम्बरम तथा राज्य के गृहमंत्री शान्ति धारीवाल के इस्तीफे की मांग की है। जैसा प्रकरण है, उनकी मांग बिलकुल जायज है। बेशक अजमेर में अवैधानिक तथा सुरक्षा नियमों के विपरीत हुई पाक वाणिज्य  मंत्री मकदूम अमीन फहीम की सभा कराने तथा इसमें सीमावर्ती जिलों से हजारों की तादाद में लोगों को लाने की कार्यवाही राष्ट्र की सुरक्षा के लिए खतरा है, मगर सवाल ये उठता है क्या भाजपा नेता दोहरा मापदंड अपना  रहे हैं?
पाठकों को याद होगा कि काफी दिन पहले तीर्थराज पुष्कर में बिना वीजा के घूमते पकड़े गए पाकिस्तान के सिंध प्रांत के 66 हिंदू तीर्थ यात्रियों को कथित रूप से लालकृष्ण आडवाणी ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर बिना किसी कार्यवाही के छुड़वा दिया। इतना ही नहीं उन्हें आगे की यात्रा भी जारी रखने की इजाजत दिलवा दी थी। कुछ हिंदूवादी संगठनों व भाजपा विधायक प्रो. वासुदेव देवनानी के आग्रह पर आडवाणी के इस प्रकार दखल करने से एक नई बहस छिड़ गई थी।
हुआ यूं था कि जैसे ही पाकिस्तान के सिंधी तीर्थयात्रियों के बिना वीजा पुष्कर में पकड़े जाने की सूचना आई, हिंदूवादी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ व भारतीय सिंधु सभा के पदाधिकारी सक्रिय हो गए। उन्होंने पुष्कर पहुंच कर सीआईडी के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक गजानंद वर्मा पर दबाव बनाया कि उन्हें बिना किसी कार्यवाही के छोड़ दिया जाए, क्योंकि वे हिंदू तीर्थयात्री हैं। वर्मा ने उनकी एक नहीं सुनी, उलटे उन्हें डांट और दिया। बहरहाल उन्हें पाक तीर्थ यात्रियों से मिलने और उनकी सेवा-चाकरी करने छूट जरूर दे दी। जब हिंदूवादी संगठनों और विधायक प्रो. वासुदेव देवनानी को लगा कि स्थानीय स्तर पर दबाव बनाने से कुछ नहीं होगा, उन्होंने ऊपर संपर्क किया। आडवाणी को फैक्स किए और गृह मंत्रालय से भी इस मामले में नरमी बरतने का आग्रह किया। इस पर भी जब दाल नहीं गली तो पाक जत्थे में एक प्रभावशाली व्यक्ति ने भी अपने अहमदाबाद निवासी समधी के जरिए आडवाणी से मदद करने का आग्रह किया। अहमदाबाद निवासी उस व्यापारी के आडवाणी से करीबी रिश्ते होने के कारण आखिरकार उन्हें मशक्कत करनी पड़ी। जानकारी के मुताबिक आडवाणी ने अपने स्तर पर केन्द्र व राज्य के अधिकारियों से संपर्क साधा और पाक तीर्थयात्रियों को बेकसूर बता कर उन्हें छोडऩे का आग्रह किया। भारी दबाव में आखिरकार सीआईडी मुख्यालय को उन्हें बिना कोई कार्यवाही किए आगे की यात्रा के लिए जाने की इजाजत देनी पड़ी।
उसी के अनुरूप सीआईडी पुलिस के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक गजानंद वर्मा को यह रिपोर्ट देनी पड़ी कि तीर्थ यात्रियों ने भूल से वीजा नियमों का उल्लंघन किया है और ट्रेवल एजेंसी संचालकों ने उन्हें इस बारे में जानकारी नहीं दी थी, मगर जिस तरह घटनाक्रम घूमा, उससे स्पष्ट है कि तीर्थयात्री जानते थे कि वे वीजा में उल्लेख न होने के बावजूद पुष्कर का भ्रमण कर रहे हैं। इसकी पुष्टि इस बात से होती है कि जत्थे में से एक यात्री ने यहां मीडिया को बताया था कि उनका पुष्कर यात्रा का कोई कार्यक्रम नहीं था, लेकिन जब उन्हें मुनाबाव में पता लगा कि पुष्कर भी एक प्रमुख तीर्थस्थल है तो मुनाबाव में भारतीय अधिकारियों ने कहा कि वीजा में पुष्कर का अलग से उल्लेख करने की जरूरत नहीं है, वे चाहें तो खाना खाने के बहाने से वहां कुछ देर घूम सकते हैं। उस यात्री ने ही दबाव बनाया था कि उन्हें मुनाबाव में भारतीय अधिकारियों ने गुमराह किया था, वरना वे पुष्कर में नहीं उतरते।
बहरहाल, सीआईडी के नरम रुख की चर्चा इस कारण उठी है क्योंकि पिछले उर्स मेले के दौरान चार पाक जायरीन भी इसी तरह बिना वीजा के पुष्कर गए और वहां ब्रह्मा मंदिर में प्रवेश करते हुए पकड़े गए तो उनके खिलाफ सीआईडी की ओर से ब्लैक लिस्टेड करने की सिफारिश की गई थी। तब सवाल ये भी उठाया गया था कि यदि भारत के हिंदू राष्ट्रीयता को छोड़ कर पाकिस्तान के हिंदुओं के प्रति सोफ्ट कॉर्नर रखते हैं तो यदि भारत के मुसलमान कभी पाकिस्तान के मुस्लिमों के प्रति सोफ्ट कॉर्नर रखते हैं तो उसमें ऐतराज क्यों किया जाता है? यानि कि धर्म निश्चित रूप से राष्ट्रों की सीमा से बड़ा है।
उससे भी बड़ी बात ये है कि एक ओर तो भाजपा बिना अनुमति के पाक मंत्री की सभा होने पर ऐतराज करती है, दूसरी ओर बिना बीजा के पुष्कर आए हिंदू पाकिस्तानियों के प्रति नरम रुख रखती है। सही क्या है और गलत क्या, यह पाठक ही तय कर सकते हैं।
tejwanig@gmail.com

2.10.11

2 October

मसला कोई भी और कितना भी बिगड़ा हुआ क्यों न हो लेकिन वह जब भी सुलझेगा , बातचीत से ही सुलझेगा .
यह एक अहम सूत्र है.
ब्लॉगर्स मीट वीकली का मकसद यही है कि फासले कम हों और गलतफहमियां दूर हों .
आप सभी के विचार अमूल्य हैं , हिन्दी ब्लौगिंग को समृद्ध करने में इनका उपयोग करें.

 ब्लॉगर्स मीट वीकली (11)

क्या इन टोटको से भर्ष्टाचार खत्म हो सकता है ? आप देखिए कि अन्ना कैसे-कैसे बयान दे रहे हैं? शरद पवार भ्रष्ट हैं। भ्रष्टाचार पर बनी जीओएम (मंत्रिसमूह) में फला-फलां और फलां मंत्री हैं। इसलिए इस समिति का कोई भविष्य नहीं है। पवार को तो मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे देना चाहिए। पवार का बचाव करने की कोई जरूरत नहीं है। अगर पवार के मंत्रिमंडल से बाहर हो जाने से भ्रष्टाचार