मेरी इस छोटी सी दुनिया में आप सब का स्वागत है.... अब अपने बारे में क्या बताऊँ... सिलसिला ज़ख्म ज़ख्म जारी है, ये ज़मी दूर तक हमारी है, मैं बहुत कम किसी से मिलता हूँ, जिससे यारी है उससे यारी है... वो आये हमारे घर में खुदा की कुदरत है, कभी हम उनको तो कभी अपने घर को देखते हैं...
24.4.11
22.4.11
अन्ना का आह्वान भ्रष्टाचार को उखाड़ फेंको
किसन बाबूराव हजारे यानी अन्ना हजारे के बारे में कुछ लिखना कलम के साथ न्याय करना नहीं होगा, क्योंकि उनकी निस्वार्थ खूबियों की कतार इतनी लम्बी है कि समय के बीतने का एहसास नहीं होता। पद्मभूषण और पद्मश्री जैसे राष्ट्रीय सम्मान पा चुके समाजसेवक अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार के खिलाफ एक बड़ी जंग छेड़ दी है। वे भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था के लिए जरूरी लोकपाल विधेयक की लड़ाई लड़ रहे हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ बिगुल बजाने वाले अन्ना हजारे से हाल ही हुई बातचीत के खास अंश।
आप भ्रष्टाचार रहित व्यवस्था की एक महत्वपूर्ण लड़ाई लड़ रहे हैं। क्या वाकई लोकपाल विधेयक इस मंशा को पूरा कर सकेगा?
मुझे पूरा यकीन है कि लोकपाल विधेयक भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था का निर्माण कर सकेगा। लोकपाल विधेयक में भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कदम उठाने की अनुशंसा की गई है। उसमें कहा गया है कि भ्रष्टाचार संबंधी शिकायत पर सबसे पहले संबंघित व्यक्ति को जेल भेज देना चाहिए बाद में तहकीकात की जाए। बडे भ्रष्टाचार में संबंघित व्यक्ति के अलावा परिवार के सभी सदस्यों की संपत्ति जब्त कर नीलाम कर देनी चाहिए। ए राजा जैसे लोगों को सीधा फांसी पर लटका देना चाहिए। लेकिन सवाल ये है कि यह सब सरकार के मुश्किल से गले उतर रहा है।
मुसीबत में ऎसी कौनसी ताकत है जो आपको हमेशा आगे बढ़ने का हौसला देती रही?
पिछले 35 साल से संघर्ष कर रहा हूं। कोई है जो मेरे पीछे खड़ा मुझे आगे बढ़ने की प्रेरणा दे रहा है। ईश्वर पर मुझे पूरा भरोसा है, जब जिंदगी का मकसद त्याग, बलिदान और शुद्ध आचरण हो जाए तो ईश्वर भी आपके साथ खड़ा होता है। इस बात का एहसास मुझे होता रहा है।
समाज के लिए कुछ कर गुजरने की प्रेरणा आपको कैसे मिली?
मेरी उम्र करीब 26 साल की रही होगी, उन दिनों मेरी पोस्टिंग पंजाब से सटे खेमकरन में लगी हुई थी। लड़ाई में मेरे सारे साथी मारे गए, मुझे मामूली चोटें आइंü। मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर मानव जीवन का अर्थ क्या है, लेकिन लाख कोशिश के बाद भी मुझे इस सवाल का जवाब नहीं मिला। मैंने आत्महत्या करने का मन बना लिया।
लेकिन ठीक उन्हीं दिनों मुझे विवेकानंद की किताब 'कॉल टु दि यूथ फॉर नेशन' मिली, वो किताब मेरे जीवन के लिए टर्निंग पॉइंट साबित हुई। मुझे जीवन का मकसद मिल गया कि समाजसेवा में ही जीवन का असली सुख है। और सच कहूं तो बड़े-बड़े उद्योगपतियों को ऎसा आनंद नहीं मिलता होगा जो मुझे लोगों का दर्द बांटने में मिलता है।
सुना है आप हर महीने अपनी पेशन गांवों के विकास फंड में जमा कर देते हैं। तब आपका खर्च कैसे चलता है?
मेरा अपना कोई खर्च नहीं है। बस एक वक्त का खाना और दो जोड़ी कपड़े। बच्चों के लिए चल रहे हॉस्टल से खाना मिल जाता है। 8 बाई 10 का एक कमरा है जिसके कोने में एक बिस्तर लगा हुआ है। हर महीने 6 हजार रूपए पेंशन आती है। वो किसी न किसी दीन दुखी की मदद में काम आ जाती है। अभी तक मुझे 25 लाख रूपए नकद इनाम के रूप में मिल चुके हंै जिनसे हर महीने ब्याज आता है। उस ब्याज से हर साल किसी गरीब की बेटी की शादी हो जाती है।
आर्मी का अनुशासन आपके जीवन में आज भी कायम है?
बिलकुल, आर्मी की लाइफ ने मुझे मेरा मकसद पूरा करने में बड़ी मदद की। अनुशासन ही था जिसके बूते रालेगन सिद्धी जैसे गांव की तस्वीर बदल सका। उस गांव में 80 फीसदी लोग भुखमरी में जीवन गुजार रहे थे। 40 शराब के ठेके थे। लेकिन आज वहां न तो एक शराब का ठेका है और न ही पूरे गांव में पान, गुटका, बीड़ी का कोई सेवन करता है।
फिल्में देखना पसंद करते हैं?
आर्मी में जाने से पहले मुझे फिल्मों का शौक था। मैं 50 साल पहले की बात कर रहा हूं। लेकिन उसके बाद तो फिल्मों के नाम तक पता नहीं हैं।
आपने जीवनभर अविवाहित रहने का फैसला क्यों किया ?
मुझे अपने फैसले पर कोई पछतावा नहीं है बल्कि मुझे खुशी है कि मेरा परिवार इतना बड़ा है कि वहां मैं और मेरा जैसे शब्दों के लिए कोई जगह नहीं है। छोटा परिवार दुख देता है, जबकि बड़ा परिवार आनंद।
पद्मभूषण और पद्श्री जैसे सम्मान आपके जीवन में कितने मायने रखते हैं।
मैंने कोई भी काम सम्मान पाने के लिए नहीं किया और न ही मेरा जीवन में इनका कोई मतलब है। मैंने अपने लेटर हेड पर किसी सम्मान का जिक्र नहीं किया।
अन्ना की जिंदगीसंघर्षो की दास्तां
अन्ना की शख्सियत बडे अनगढ़ तरीके से गढ़ी हुई है। 15 जून 1938 को महाराष्ट्र के अहमद नगर के भिंगर कस्बे में जन्मे अन्ना का बचपन बहुत गरीबी में गुजरा। पिता मजदूर थे। दादा फौज में।
दादा की पोस्टिंग भिंगनगर में थी। वैसे अन्ना के पुरखों का गांव अहमद नगर जिले में ही स्थित रालेगन सिद्धि में था। दादा की मौत के सात साल बाद अन्ना का परिवार रालेगन आ गया। अन्ना के छह भाई हैं। परिवार में तंगी का आलम देखकर अन्ना की बुआ उन्हें मुम्बई ले गईं। वहां उन्होंने सातवीं तक पढ़ाई की। परिवार पर कष्टों का बोझ देखकर वह दादर स्टेशन के बाहर एक फूल बेचनेवाले की दुकान में 40 रूपए की पगार में काम करने लगे। इसके बाद उन्होंने फूलों की अपनी दुकान खोल ली और अपने दो भाइयों को भी रालेगन से बुला लिया। छठे दशक के आसपास वह फौज में शामिल हो गए। उनकी पहली पोस्टिंग बतौर ड्राइवर पंजाब में हुई।
यहीं पाकिस्तानी हमले में वह मौत को धता बता कर बचे थे। इसी दौरान नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से उन्होंने विवेकानंद की एक बुक को पढ़ने के बाद उन्होंने अपनी जिंदगी समाज को समर्पित कर दी। उन्होंने गांधी और विनोबा को भी पढ़ा। 1970 में उन्होंने आजीवन अविवाहित रहने का संकल्प किया। मुम्बई पोस्टिंग के दौरान वह अपने गांव रालेगन आते-जाते रहे। चट्टान पर बैठकर गांव को सुधारने की बात सोचते रहते। जम्मू पोस्टिंग के दौरान 15 साल फौज में पूरे होने पर 1975 में उन्होंने वीआरएस ले लिया और गांव में आकर डट गए।
मॉडर्न बाबाओं की यूथ ब्रिगेड
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मॉडर्न बाबाओं की यूथ ब्रिगेड
आज के यूथ ने धर्म, अध्यात्म और प्रवचन जैसे अनछुए समझे जाने वाले क्षेत्र में भी सेंधमारी कर ली है। नतीजा यह है कि धार्मिक चैनल्स और शहर में होने वाले प्रवचनों में यंग बाबाओं का बोलबाला है। जब ये बाबा मन को मोहने वाले बेहतरीन अंदाज, सारगर्भित भाषा में मंच पर ईश्वर का गुणगान करते हैं, तो लगता है मानो अमृत बंट रहा हो। प्रवचन कार्यक्रमों में युवाओं की धमाकेदार एंट्री पर खास पेशकश-
कथावाचक नहीं शांतिदूत हैं
उनका पूरा नाम है देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज। उम्र 32 साल, लेकिन विचारों में इतना प्रवाह और आवाज में इतनी मधुरता कि जो सुने बस सुनता रह जाए। जब वे कृष्णभक्ति में डूबकर भजन सुनाते हैं तो सुनने वाले सुध-बुध खो बैठते हैं। धार्मिक चैनलों पर धाराप्रवाह से प्रवचन देने वाले ठाकुरजी महाराज मथुरा के रहने वाले हैं और कृष्णभक्ति उनमें कूट-कूटकर भरी है। छह साल की उम्र में ही वे घर छोड़कर वृंदावन पहुंच गए और श्रीधाम में रहने लगे। उन्होंने यहां लंबी साधना की और 18 साल की उम्र में पहली बार भजन संध्या में भाग लिया। इसके बाद तो वे लाखों भक्तों के मन में बस गए। देश के तमाम शहरों में उन्होंने भजन सुनाए, प्रवचन दिए तो उनकी कीर्ति देश के बाहर भी पहुंची। अमरीका, हांगकांग, स्वीडन, डेनमार्क, नार्वे, हालैंड जैसे देशों में धर्म और अध्यात्म की अलख जलाई ठाकुरजी महाराज ने। श्रीकृष्ण और राधा के परम भक्त ठाकुर जी महाराज सिर्फ अध्यात्म का प्रचार-प्रसार ही नहीं कर रहे हैं, जनजागरण की मुहिम भी चला रहे हैं। उनका ट्रस्ट गरीब बच्चों के लिए इंटरमीडियट तक की शिक्षा के लिए आवासीय स्कूल बनवा रहा है, जो दस एकड़ जमीन में फैला हुआ है। देश के मशहूर कथावाचक उन्हें 'शांतिदूत' की संज्ञा देते हैं। श्री निंबार्क संप्रदाय और श्याम शरण देवाचार्य कहते हैं, 'जिस तरह श्रीकृष्ण युद्ध से पहले दुर्योधन के पास शांतिदूत बनकर गए थे, उसी तरह ठाकुरजी दुनिया के सामने शांतिदूत बनकर शांति की अलख जगा रहे हैं।
देवकीनंदन ठाकुरजी
देश के अलावा विदेशों में भी भारतीय संस्कृति और श्री कृष्ण का महिमामंडन कर रहे हैं। स्वीडन, डेनमार्क जैसे दर्जनों देशों में उनके हजारों मुरीद हैं।
देवकीनंदन ठाकुर
यूथ की पहली पसंद
बृजभूमि के पैगौन में 23 जुलाई 1984 को वैष्णव ब्राह्मण कुल मे संजीव कृष्ण ठाकुर का नाम श्रेष्ठ भागवत कथावाचकों में लिया जाता है। उनके कार्यक्रमों में महिला और बुजुर्ग ही नहीं युवाओं की भी अच्छी खासी तादाद रहती है। संजीव का रूझान बचपन से ही भजन-पूजन और प्रवचनों में रहा। नतीजा यह रहा कि वे बहुत कम उम्र में ही हमउम्र बच्चों के बीच प्रवचन देने लगे। संजीव पढ़ने में इतने कुशाग्र थे कि अध्यापक भी हैरत में पड़ जाते थे। उनकी संस्कृत में गजब की पकड़ थी। सात साल की उम्र में ही ठाकुर जी भागवत, रामायण, गीता, शिवपुराण आदि को अपनी दादी अम्मा को सुना दिया करते थे। नौ साल की उम्र में उन्होंने घर छोड़ दिया और 12 साल की उम्र में उन्हें व्यासपीठ की गद्दी मिल गई। देश के लगभग सभी हिस्सों और विदेशों में प्रवचन के जरिए धर्म की अलख जगाने वाले संजीव युवाओं की पहली पसंद हैं।
संजीव कृष्ण
जगाई धर्म की अलख
पुलक सागर महाराज। उम्र सिर्फ 40 साल। दमकते चेहरे पर हल्की दाढ़ी और आंखों पर चश्मा। दुनिया भर के जैन धर्म के अनुयायियों के दिलों में बसते हैं पुलक सागर महाराज। वे धर्म का प्रचार करते हैं, संस्कारों की शिक्षा देते हैं। मुक्ति और मोक्ष का मार्ग बताते हैं, साथ ही धार्मिक कट्टरता, अंधविश्वास और जादू-टोने पर करारा हमला बोलते हैं। पुलक सागर महाराज ने स्नातक की पढ़ाई की और 1993 में ही सार्वजनिक जीवन का परित्याग कर दिया। प्रसिद्ध जैन मुनि विद्यासागर जी महाराज के साçन्नध्य में मिढ्याजी तीर्थ जबलपुर में उन्होंने ब्रह्मचर्य व्रत लिया। 11 सितंबर 1995 को कानपुर के पास आनंदपुरी में उन्होंने दीक्षा ली और फिर जैन धर्म के प्रचार प्रसार में जुट गए। जैन मुनि पुलक सागर महाराज दिगंबर संत हैं। उनकी वाणी में जैसे कोई जादू है, जब वह प्रवचन करते हैं तो देखते ही देखते हजारों की भीड़ जमा हो जाती है। धार्मिक चैनल बड़े आदर के साथ उनके प्रवचन प्रसारित करते हैं।
पुलक सागर
महिला गुरू भी पीछे नहीं
आमजन में भक्तिभाव जगाने और धर्म की जड़ को हरी रखने में युवा किशोर ही नहीं महिला गुरू भी खासी तादाद में आने लगी हैं। मां ऋतंभरा से लेकर शिवानी बहन, बहन नमेश्वरी पंड्या, अमृतानंदमयी मां, आनंदमूर्ति गुरू मां, बह्मकुमारी, गुरू मां आनंदमयी समेत दर्जनों महिला गुरू लोगों को भक्ति रस में डूबोकर उन्हें शांति के मार्ग पर ले जाने की कोशिश कर रही हैं।
शिवानी बहन
हर जुबां पर हो राधानाम
उनके मुख से कृष्णवाणी सुनकर सुधबुध खोना आम बात है। 6 जुलाई 1984 को वृंदावन के श्रीधाम में जन्म लेने वाले गौरव कृष्ण, मृदुल कृष्ण जी के बेटे हैं। पंद्रहवीं शताब्दी में वृंदावन में हरिदासजी महाराज का जन्म हुआ। गौरव कृष्ण उसी परिवार का हिस्सा हैं। गौरव कृष्णजी श्रीमद्भागवत कथा वाचन में निपुण हैं। वैष्णवी परिवार में जन्मे गौरव शुरूआत से ही कृष्ण में आसक्ति रखने वाले रहे। गौरव कृष्ण की कई पीढियां प्रवचन के जरिए मशहूर रही हैं। अपने दादा आचार्य मूलचंद बिहारी शास्त्रीजी और पिता आचार्य मृदुल कृष्ण शास्त्री का साçन्नध्य गौरव को खूब मिला। वे उनके साथ जाते और उनके रास्ते पर चलते हुए ईश्वर के गुणगान करने लगे। वे कई वेदों के ज्ञाता और संस्कृत के प्रकांड विद्वान हैं। गौरव कृष्ण ने अटारह साल की उम्र में पहली बार भागवत का पाठ किया। सात दिनों तक हजारों लोगों के सामने ऎसे पूरे पांडाल में भक्ति रस की गंगा बहने लगी। कहते है गौरव कृष्ण जब श्रीकृष्ण का गौरवगान करते हैं, तो लोगों को लगता है मानों उनके सामने कृष्ण अठखेलियां कर रहे हैं। कई देशों में भक्ति रस लुटाकर लाखों लोगों को राधेकृष्ण का प्रशंसक बना रहे हैं। कथाओं में हर बार नयापन और ताजगी लोगों को प्रभावित करती है। इतनी कम उम्र होने के बाद भी उनकी वाणी से लोग मंत्रमुग्ध हुए बगैर नहीं रह पाते।
गौरव कृष्ण
यदुनाथ जी महाराज
देश के युवा और ओजस्वी संतों में से एक हैं यदुनाथ जी। गुजरात यूनिवर्सिटी से उन्होंने उच्च शिक्षा ली और मन रम गया धर्म और अध्यात्म में। आज देश और दुनिया में उनकी कीर्ति फैली हुई है। अध्यात्म के साथ ही वह देश और समाज कल्याण से जुड़े कामों बढ़ चढ़कर भागीदारी करते हैं।
धराचार्य जी महाराज
वृंदावन के युवा संत धराचार्य जी देश के जाने माने कथावाचक हैं। श्रीमद्भागवत की कथा समेत कई वेदों के वे मर्मज्ञ माने जाते हैं। कृष्णभक्ति की परंपरा में देश के सबसे लोकप्रिय संतों और कथावाचकों में शामिल हंै धराचार्य जी का नाम।
आनंद कृष्ण शास्त्री
आनंद कृष्ण शास्त्री जी 20 वर्ष की आयु में निपुण कथावचक के रूप में प्रतिष्ठित हुए। इनकी कथा शैली इतनी सरस और सरल है कि हर वर्ग के श्रोता भरपूर आनंद लेते हैं। आनंद कृष्ण देश के कई हिस्सों और विदेशों में भी सनातन धर्म प्रचार-प्रसार कर रहे हैं।
20.4.11
क्या इन टोटको से भर्ष्टाचार खत्म हो सकता है ?
क्या इन टोटको से भर्ष्टाचार खत्म हो सकता है ?
भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में अपनी जान को दांव पर लगा देने वाले बुजुर्ग समाजसेवी अन्ना हजारे की तारीफों से आजकल मीडिया का हर कोना भरा हुआ है। नवभारत टाइम्स के इस ब्लॉग पर भी कई साथी ब्लॉगर (ताजा उदाहरण है रमाशंकर सिंह के ब्लॉग बतंगड़ की नई पोस्ट) यह काम कर चुके हैं। ठीक भी है। आखिर अन्ना कोई निजी लड़ाई तो लड़ नहीं रहे। भ्रष्टाचार से देश की बहुत बड़ी आबादी पीड़ित है और इन सबकी तरफ से पहलकदमी करते हुए अन्ना ने अगर आमरण अनशन का संकल्प कर लिया है तो यह कोई छोटी बात नहीं। हर संभव तरीके से अन्ना की इस मुहिम को न केवल समर्थन देना चाहिए बल्कि और मजबूत बनाते हुए इसे इसकी तार्किक परिणति तक पहुंचाने की कोशिश करनी चाहिए।
मगर सवाल यह है कि इसे मजबूत बनाने के क्या तरीके हो सकते हैं। एक तो यह कि इसकी तारीफ करते हुए शब्दों का पहाड़ खड़ा कर दिया जाए। आम तौर पर पूरा मीडिया यह काम कर ही रहा है। दूसरा तरीका यह है कि सांकेतिक और क्रमिक अनशन, रैली, मोमबत्ती मार्च आदि कार्यक्रमों के जरिए अन्ना की मुहिम को समर्थन दिया जाए। यह काम भी देश के तमाम हिस्सों में हो रहा है। इसके अलावा एक और तरीका है अन्ना की इस मुहिम को मजबूती देने का। वह है इस मुहिम के वैचारिक पक्षों की पड़ताल करते हुए इसकी कमजोरियों को रेखांकित किया जाए ताकि उसे दूर कर इस मुहिम को ज्यादा कारगर बनाया जा सके।
सच पूछें तो यह सबसे जरूरी काम है जो इस मुहिम के शुभचिंतकों को करना चाहिए। लेकिन, यही काम ढंग से होता नहीं दिख रहा। मुहिम का शोर तो बहुत हो रहा है, लेकिन इसे ज्यादा मजबूत, ज्यादा कारगर, ज्यादा तर्कसंगत बनाने की कोशिश कम से कम सार्वजनिक मंचों पर अपवादस्वरूप ही दिख रही है। चूंकि अन्ना हजारे का कोई निजी स्वार्थ नहीं है और सार्वजनिक कल्याण के भाव से सबके हित को देखते हुए उन्होंने यह मुहिम शुरू की है, इसलिए निश्चित तौर पर खुद अन्ना भी ऐसी किसी कोशिश का समर्थन ही करेंगे। मगर, यही बात उनके उन उत्साही समर्थकों के बारे में नहीं कही जा सकती, जो इस मुहिम का शोर मचाते हुए इसके लिए जीने-मरने का खोखला एलान करने को ही सफलता की गारंटी समझ बैठे हैं। बहुत संभव है कि ऐसी किसी कोशिश को ये उत्साही समर्थक मुहिम के विरोध के रूप में लें और ऐसा करने वालों को विरोधी खेमे का करार दें। यह भी एक वजह हो सकती है ऐसी किसी कोशिश के सामने न आने की।
मगर, यह जरूरी है। खासकर इसलिए भी कि अगर इस मुहिम के वैचारिक पक्ष की कमजोरियों पर एक नजर डालें तो साफ हो जाता है कि यह मुहिम अपने मौजूदा स्वरूप में दुश्मन का (अगर दुश्मन किसी खास व्यक्ति को नहीं बल्कि भ्रष्टाचार की सर्वव्यापी प्रवृत्ति को माना जाए) कुछ खास नहीं बिगाड़ सकती। अधिक से अधिक यह देश भर में भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष का माहौल बना सकती है लेकिन वह भी बहुत थोड़ी देर के लिए। अगर इस मुहिम ने अपने रंग-रूप और चरित्र में बड़े बदलाव नहीं किए तो प्रबल संभावना यही है कि कुछ ही दिनों में यह मुहिम देशवासियों के मन में जीत का झूठा एहसास दिलाते हुए समाप्त हो जाए। और अगर ऐसा होता है तो इसके लिए जिम्मेदार सरकार और विपक्ष में बैठी वे ताकतें नहीं होंगी जो रूप बदलने की कला में माहिर हैं और ज्यादातर मामलों में दुश्मन के ही वेश में दुश्मन के सामने जाती हैं ताकि लड़ाई के निर्णायक पलों में दुश्मन को अपने समर्थकों से खास मदद न मिल सके। इसके लिए जिम्मेदार होंगे वे लोग जो इस मुहिम के समर्थक हैं, इसे कामयाब बनाना चाहते हैं, लेकिन इसे मजबूत और कारगर बनाने की कोशिश नहीं कर रहे, यह सोचकर कि कहीं उन्हें विरोधी न मान लिया जाए।
बहरहाल, बात मुहिम की कमजोरियों की हो रही थी। इस मुहिम की सबसे बड़ी ताकत अगर अन्ना की निष्पक्ष और ईमानदार छवि है तो इसकी सबसे बड़ी कमजोरी इसका अराजनीतिक चरित्र है। ध्यान दें कि राजनीति का मतलब किसी खास दल से जुड़ाव ही नहीं है। अगर यह आंदोलन मौजूदा सभी राजनीतिक दलों को खारिज करता है और खुद को उन सबसे अलग रखता है तो यह बहुत अच्छी बात है। लेकिन, अगर यह राजनीति मात्र को अपने एजेंडे से बाहर रखता है तो इसका मतलब यह जाने-अनजाने खुद को और लोगों को भुलावे में रख रहा है। यही इस आंदोलन का सबसे कमजोर बिंदु है और इसी वजह से इसका पिटना करीब-करीब तय है।
आप देखिए कि अन्ना कैसे-कैसे बयान दे रहे हैं? शरद पवार भ्रष्ट हैं। भ्रष्टाचार पर बनी जीओएम (मंत्रिसमूह) में फला-फलां और फलां मंत्री हैं। इसलिए इस समिति का कोई भविष्य नहीं है। पवार को तो मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे देना चाहिए।
पवार का बचाव करने की कोई जरूरत नहीं है। अगर पवार के मंत्रिमंडल से बाहर हो जाने से भ्रष्टाचार के राक्षस का खात्मा हो जाता है तो उन्हें कल नहीं आज कैबिनेट से निकाल फेंकना चाहिए। लेकिन क्या समस्या इतनी सरल है? क्या पवार को हटा देने से भ्रष्टाचार मिट जाएगा? कृपया यह न कहें कि कम से कम एक शुरुआत तो होगी। अन्ना ने अपनी जिंदगी शुरुआत के लिए दांव पर नहीं लगाई है, खात्मे के लिए लगाई है। हमारा मकसद भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई की शुरुआत करना नहीं, बल्कि उस लड़ाई का निर्णायक और पॉजिटिव अंत करना है। क्या किसी पवार, किसी मोइली, किसी सिब्बल के कैबिनेट से हट जाने से यह मकसद हासिल हो जाएगा? कहने को तो कांग्रेस भी कह रही है कि उसने ए. राजा को कैबिनेट से हटाकर जेल तक पहुंचा दिया और इस प्रकार भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई को आगे बढ़ाया है। क्या उसके इस दावे को स्वीकार किया जा सकता है?
मगर, यह जरूरी है। खासकर इसलिए भी कि अगर इस मुहिम के वैचारिक पक्ष की कमजोरियों पर एक नजर डालें तो साफ हो जाता है कि यह मुहिम अपने मौजूदा स्वरूप में दुश्मन का (अगर दुश्मन किसी खास व्यक्ति को नहीं बल्कि भ्रष्टाचार की सर्वव्यापी प्रवृत्ति को माना जाए) कुछ खास नहीं बिगाड़ सकती। अधिक से अधिक यह देश भर में भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष का माहौल बना सकती है लेकिन वह भी बहुत थोड़ी देर के लिए। अगर इस मुहिम ने अपने रंग-रूप और चरित्र में बड़े बदलाव नहीं किए तो प्रबल संभावना यही है कि कुछ ही दिनों में यह मुहिम देशवासियों के मन में जीत का झूठा एहसास दिलाते हुए समाप्त हो जाए। और अगर ऐसा होता है तो इसके लिए जिम्मेदार सरकार और विपक्ष में बैठी वे ताकतें नहीं होंगी जो रूप बदलने की कला में माहिर हैं और ज्यादातर मामलों में दुश्मन के ही वेश में दुश्मन के सामने जाती हैं ताकि लड़ाई के निर्णायक पलों में दुश्मन को अपने समर्थकों से खास मदद न मिल सके। इसके लिए जिम्मेदार होंगे वे लोग जो इस मुहिम के समर्थक हैं, इसे कामयाब बनाना चाहते हैं, लेकिन इसे मजबूत और कारगर बनाने की कोशिश नहीं कर रहे, यह सोचकर कि कहीं उन्हें विरोधी न मान लिया जाए।
बहरहाल, बात मुहिम की कमजोरियों की हो रही थी। इस मुहिम की सबसे बड़ी ताकत अगर अन्ना की निष्पक्ष और ईमानदार छवि है तो इसकी सबसे बड़ी कमजोरी इसका अराजनीतिक चरित्र है। ध्यान दें कि राजनीति का मतलब किसी खास दल से जुड़ाव ही नहीं है। अगर यह आंदोलन मौजूदा सभी राजनीतिक दलों को खारिज करता है और खुद को उन सबसे अलग रखता है तो यह बहुत अच्छी बात है। लेकिन, अगर यह राजनीति मात्र को अपने एजेंडे से बाहर रखता है तो इसका मतलब यह जाने-अनजाने खुद को और लोगों को भुलावे में रख रहा है। यही इस आंदोलन का सबसे कमजोर बिंदु है और इसी वजह से इसका पिटना करीब-करीब तय है।
आप देखिए कि अन्ना कैसे-कैसे बयान दे रहे हैं? शरद पवार भ्रष्ट हैं। भ्रष्टाचार पर बनी जीओएम (मंत्रिसमूह) में फला-फलां और फलां मंत्री हैं। इसलिए इस समिति का कोई भविष्य नहीं है। पवार को तो मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे देना चाहिए।
पवार का बचाव करने की कोई जरूरत नहीं है। अगर पवार के मंत्रिमंडल से बाहर हो जाने से भ्रष्टाचार के राक्षस का खात्मा हो जाता है तो उन्हें कल नहीं आज कैबिनेट से निकाल फेंकना चाहिए। लेकिन क्या समस्या इतनी सरल है? क्या पवार को हटा देने से भ्रष्टाचार मिट जाएगा? कृपया यह न कहें कि कम से कम एक शुरुआत तो होगी। अन्ना ने अपनी जिंदगी शुरुआत के लिए दांव पर नहीं लगाई है, खात्मे के लिए लगाई है। हमारा मकसद भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई की शुरुआत करना नहीं, बल्कि उस लड़ाई का निर्णायक और पॉजिटिव अंत करना है। क्या किसी पवार, किसी मोइली, किसी सिब्बल के कैबिनेट से हट जाने से यह मकसद हासिल हो जाएगा? कहने को तो कांग्रेस भी कह रही है कि उसने ए. राजा को कैबिनेट से हटाकर जेल तक पहुंचा दिया और इस प्रकार भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई को आगे बढ़ाया है। क्या उसके इस दावे को स्वीकार किया जा सकता है?
अन्ना सुधार चाहते हैं या सुधारों की मौत?
यह लीजिए आरएसएस ने तो अपने ही मुंह से सारी बातें स्वीकार कर लीं। कल तक इसी आरएसएस के लोग भगवा आतंकवाद का नाम सुनकर ही भड़क जाते थे। हिंदू समुदाय के किसी शख्स को आतंकवादी तो क्या, दंगाई कहने पर भी ये वैसे ही भड़कते थे। इनका घोषित स्टैंड रहा है कि चूंकि हिंदू सदियों से सहिष्णु और उदार रहा है, इसलिए इनकी अगुवाई में हिंदू समुदाय के मुट्ठी भर लोग दंगा, मारपीट, आगजनी, रेप और बम विस्फोट के चाहे जितने भी कांड कर लें, उन्हें दंगाई, रेपिस्ट, आतंकवादी वगैरह कहना हिंदुत्व का अपमान है और उस कथित अपमान पर ये सब बिफर जाते थे। मगर, इसी संघ ने अब 'इटैलियन देवी की कृपा से गद्दी पर बैठे' प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को पत्र लिखकर कहा है कि भगवा आतंकवादी उसके दुश्मन हैं।
संघ के सीनियर नेता सुरेश जोशी ने पत्र में कहा है कि मालेगांव ब्लास्ट के आरोपी बर्खास्त कर्नल पुरोहित और कथित शंकराचार्य दयानंद पांडे संघ प्रमुख मोहन भागवत और इंद्रेश कुमार की जान लेना चाहते थे।
दिलचस्प बात यह है कि इसके लिए हवाला भी उन्होंने उसी महाराष्ट्र एटीएस का दिया है जिस पर हिंदू विरोधी साजिश का आरोप लगाते हुए संघ नेता थकते नहीं थे। जोशी ने कहा है कि 'महाराष्ट्र एटीएस के पास इस बात के पक्के सबूत हैं कि मालेगांव ब्लास्ट के ये दोनों आरोपी संघ नेतृत्व की हत्या की साजिश कर रहे थे।'
गौर करें तो संघ नेतृत्व के रुख में यह बदलाव अचानक नहीं बल्कि धीरे-धीरे और सुविचारित ढंग से आया है। पहले संघ यह कहता था कि कांग्रेस की ईसाई प्रभावित सरकार हिंदुओं के खिलाफ साजिश कर रही है, उन्हें आतंकवादी साबित करना चाहती है। इसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उसके बाद संघ ने यह कहना शुरू किया कि संघ में कट्टरपंथियों के लिए जगह नहीं है। और अब संघ ने कहा है कि भगवा आतंकवादी उसके दुश्मन हैं। इतना ही नहीं, संघ ने इसी 'हिंदूद्रोही सरकार' से यह भी अनुरोध किया है कि संघ के खिलाफ रची जा रही साजिश की पूरी जांच करवाए।
सवाल है कि संघ के रुख में यह बदलाव क्यों आ रहा है? आखिर जो संघ हिंदुत्व को बदनाम करने वाली सरकार से टकराने को तैयार था उसने सरकार के आगे इस मसले पर समर्पण क्यों कर दिया?
असल में संघ नेतृत्व को भी इस बात का अंदाजा नहीं था कि उसकी बीमार विचारधारा से उपजे खतरनाक कीटाणु उसके अपने संगठन पर किस कदर काबिज हो चुके हैं। संघ ने शुरू में बात को हवा में उड़ाने की कोशिश की, लेकिन भगवा आतंक की एक के बाद एक जुड़ती कड़ियों से उसके होश फाख्ता हो गए। सुरेश जोशी ने अपने पत्र में कर्नल पुरोहित और दयानंद पांडे का जिक्र तो किया है पर साध्वी प्रज्ञा समेत तमाम उन आरोपियों पर चुप्पी साध गए जो आतंकी घटनाओं में पुरोहित और पांडे के साथ रहे हैं। इस तथ्य को झुठलाना अब संघ के लिए भी संभव नहीं रह गया है कि असीमानंद से लेकर इन तमाम आरोपियों तक के संघ परिवार से जुड़े संगठनों में अच्छी पैठ थी और इनका संघ कैडर पर खासा प्रभाव भी था।
कारण यह है कि ये सब संघ की उसी विचारधारा से पोषित हो रहे थे जिससे संघ का सामान्य कैडर प्रभावित था और है। ये संघ के ही तर्कों को और आगे ले जा रहे थे। स्वाभाविक रूप से संघ का मौजूदा नेतृत्व इनके निशाने पर था। उस पर ये जरूरत से ज्यादा उदार, आलसी, डरपोक आदि होने का आरोप सामान्य कैडर के बीच लगाते थे और सामान्य कैडर इनसे प्रभावित भी होता था। संघ के अंदर इन कथित आतंकियों से प्रभावित कैडर की संख्या अच्छी-खासी है। इनका नेतृत्व पर इस बात के लिए दबाव भी है कि 'हिंदुत्व के इन योद्धाओं' का मुसीबत में साथ न छोड़ा जाए, बल्कि डटकर इनका साथ दिया जाए।
दरअसल, इन कैडर की गलती भी नहीं है। संघ नेतृत्व ने जैसी विचारधारा का पाठ उन्हें पढ़ाया है वे तो उसी पाठ को दोहरा रहे हैं। मगर, अपनी विचाराधारा की असलियत से वाकिफ संघ नेतृत्व के हाथ-पैर अब फूल रहे हैं। उसे इस बात का भी अंदाजा हो रहा है कि सांप्रदायिक घृणा का जो भस्मासुर उसने पैदा कर दिया है, वह अब तक भले दूसरों के सिर पर हाथ देता था, अब उसी केपीछे पड़ गया है। सो, इससे बचने के लिए अब संघ के नेता उसी सरकार की शरण में पहुंच गए हैं जिसे वह पानी पी-पी कर कोसते रहते थे।
सड़कों पर
सड़कों पर हो रही सभाएँ
राजा को-
धुन रही व्यथाएँ
प्रजा
कष्ट में चुप बैठी थी
शासक की किस्मत ऐंठी थी
पीड़ा जब सिर चढ़कर बोली
राजतंत्र की हुई ठिठोली
अखबारों-
में छपी कथाएँ
दुनिया भर
में आग लग गई
हर हिटलर की वाट लग गई
सहनशीलता थक कर टूटी
प्रजातंत्र की चिटकी बूटी
दुनिया को-
मथ रही हवाएँ
जाने कहाँ
समय ले जाए
बिगड़े कौन, कौन बन जाए
तिकड़म राजनीति की चलती
सड़कों पर बंदूक टहलती
शासक की-
नौकर सेनाएँ
18.4.11
सास
सास
अज्ञान का अपना अहंकार है और ज्ञान का अपना अलग। अज्ञानी अहंकार वश जितना अहित कर सकता है, ज्ञानी उससे कई गुणा अघिक नुकसान कर सकता है। वह नुकसान करने के 'क्या' और 'कैसे' को अच्छी तरह जानता, समझता है। आज तो शिक्षित भी उतना ही भले-बुरे को स्थूल दृष्टि से देखता है, जितना कि एक अज्ञानी। आज सास बहू के सम्बन्धों में इस तथ्य की झलक देखी जा सकती है। अघिकांशत: बहुएं तो शिक्षित आने लग गई। सास श्रेणी में अभी आधे से अघिक अशिक्षित हंै। इसमें एक श्रेणी और जुड़ गई। पति कम पढ़ा-लिखा अथवा बेरोजगार शिक्षित। तब उसका अपना अलग अहंकार तथा परिस्थिति जन्य संकुचन। 'इन्फीरियरटी काम्प्लैक्स' इसके बाद भौतिकवाद का नासूर। मां-बाप यह सोच नहीं पा रहे कि उन्होंने बेटियों को पढ़ाकर सही किया या गलत।
जिस नारकीय स्थिति में ऎसी बहुएं, विशेषकर कस्बों में, जी रही हैं, मार भी खाती हैं, नौकरी भी करती हैं, बच्चों को भी पालती हैं तथा घर वाले उसकी कमाई भी ले लेते हैं। किसी के मन में यह प्रश्न भी नहीं उठता कि बच्चों के मन पर क्या संस्कार पड़ते हैं। मां की स्थिति को देखकर वे पिता, दादी आदि के बारे मेें क्या सोचते होंगे। आत्मा तो सब में एक जैसी है। समझ में बराबर है। शरीर की सीमा तो उम्र के कारण होती है। ये बच्चे बड़े होकर घर वालों से कैसा व्यवहार करेंगे, इसका तो अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है। इससे भी बड़ा प्रश्A यह है कि सास ने इतने वर्षो में यहां रहकर क्या सीखा। क्या इसके कोई सास नहीं थी। किस वातावरण में सास को रहना पड़ा। घर की आर्थिक स्थिति क्या थी।
क्या सास के घर वालों ने (सास-ससुर) पीहर वालों के लिए दबाव डाला था। सास की यह मानसिकता कैसे बनी। क्या इसके मन में भी डर है कि बहू आगे निकल जाएगी तो मेरी नहीं सुनेगी 'इन्फीरियरटी काम्प्लैक्स'। क्या ऎसी सास बहू को घर की परम्पराओं की जानकारी दे पाएगी। यदि वह अपनी अलग जीवनशैली बनाकर जीती है, तो उसके बाद यह घर क्या बंधा हुआ रह सकेगा। क्या बच्चे बड़े होकर इनके व्यवहार का हिसाब नहीं करेंगे। आखिर अपने किए का फल तो स्वयं व्यक्ति को ही भोगना पड़ता है।
सास का शब्दार्थ है प्रकाशित करने वाली। बहू रूप में आई कोंपल को फूल-सा खिलाना, फूल की सौरभ बिखेरना, बगिया को हरा-भरा रखना और उसका विकास करते रहना। इस बगिया के लिए अगली पीढ़ी के माली तैयार करना। नई पीढ़ी की बहुएं किसके भरोसे इस घर में आएंगी। कौन उसको सास बनाएगा। घर-परिवार की विरासत सौंपेगी। बहू में 'ब' का अर्थ छिपा या दबा होना। 'ह' भी शक्ति के साथ प्रकट करने के लिए उपयोग किया जाता है। विसर्ग को दो गुना ताकत से बोलना ही 'ह' है। 'ऊ' का अर्थ है दूर-ऊपर-परे। बहू एक परिवार की संस्कृति साथ लेकर आती है। अहंकार वश सास उस संस्कृति का सम्मान नहीं करती। न ही कोई नई संस्कृति का दर्शन समझाती है। अत: जिस प्रकार पति-पत्नी एक न होकर दो रहते हैं, उसी प्रकार सास-बहू भी एक नहीं होते। ऎसे परिवारों को उजड़ने से कौन बचा सकता है। विधाता भी नहीं। क्योंकि संतान संवेदनशील नहीं होगी। वह पिता का भी अपमान करेगी और दादी का भी।
इस सारे वातावरण में चिंतित कौन दिखाई पड़ता है- या तो बहू अथवा बहू के पीहर वाले। बहू पर घर के बड़े हाथ उठाते हैं। पड़ौसी दुखी होते हैं। भारतीय पत्नी फिर भी पति के लिए आलोचना नहीं सहन कर पाती। इसी कारण तो अन्याय भी सहन करती है। घर में किसी को यह बात ध्यान में नहीं आती कि सास के बाद यही बहू इस घर की स्वामिनी भी होगी। यदि यह नाराज हुई तो इस घर के दरवाजे सबके लिए बन्द हो जाएंगे। स्वजन, परिजन उसकी मर्जी से ही घर पर आ सकेंगे। ठहर सकेंगे। वही इस घर की संस्कृति का निर्माण करेगी। इस परिस्थिति का लाभ अन्य लोग भी उठाने का प्रयास करते हैं। घर की महिलाएं सास के साथ जुड़ जाती हैं। वही घर की महिला-सत्ता का केन्द्र होती है। एक तरफ बहू तथा दूसरी ओर पूरा परिवार। शब्दों के कांटों का अनुमान लगाया जा सकता है। कोई उसको महत्वपूर्ण मानता ही नहीं। उसके बच्चे सुविधाओं से वंचित रहते हैं अपने ही घर में। इस घर का भविष्य इन्हीं के कंधों पर होगा।
एक सास होती है धनाढय घरों की। संस्कारों से पूर्णतया अनभिज्ञ। स्त्री भाव, मातृत्व एवं गृहस्थी का अनुभव ही नहीं। सभी प्रश्Aों का एक ही उत्तर-पैसा। उस हैसियत को भोगने की इच्छा मांगती है स्वतंत्रता। गृहस्थी मांगती है बन्धन। इस घर में हर कोई स्वतंत्र रहता है। उत्तरदायित्व, सौहाद्रü, धैर्य जैसे गुण लुप्त होते जाते हैं। सबसे पहले घर का खान-पान नौकरों के हवाले हो जाता है। मातृत्व भाव का मिठास खो चुका होता है। यही भाव घर के सदस्यों में घर कर जाता है। मिठास पर टिकी घर की नींव हिल जाती है। धीरे-धीरे घर के सारे काम छोड़कर व्यक्ति कर्महीन बन जाते हैं। वैसा ही उनका भविष्य निर्मित होता है। सुख है, शान्ति नहीं है। धन का अहंकार मर्यादा को स्वीकार भी नहीं करता तथा भोग के बाहर सुख भी नहीं मांगता। संवेदना पीछे छूट जाती है। परिजन एक ओर खड़े देखते रहते हैं। सास खाली हाथ, तो बहुएं दो कदम आगे। अगली पीढ़ी में अपराध भाव स्वत: आ जाएगा।
जीवात्मा का दर्शन और धर्म का मर्म घर में कौन समझे-समझाए। धन के सहारे धर्म करने वाले, दान अथवा अनुष्ठान करा लेते हैं। जीवात्मा संस्कारित नहीं होने से उसका पशु भाव बढ़ता ही जाता है। मानव रूप सिमटता जाता है। स्वच्छन्दता-प्रमाद-अहंकार जीवन के पर्याय बन जाते हैं। जीवन के अन्तिम पड़ाव पर पहुंचकर समझ पाते हैं कि धन सुख का कारण बन ही नहीं सकता। व्यक्ति की चेतना जड़ के पीछे भागते-भागते जड़ हो जाती है।
एक अन्य परिस्थिति भी है पश्चिम में। वहां सास होती तो है किन्तु साथ नहीं रहती। न सास-बहू का सामाजिक-सांस्कृतिक दृष्टि से सम्बन्ध होता है। वहां तलाक और विवाह होते रहना आम बात भी है। न तो सास को बहू को कुछ सिखाना पड़ता, न ही बच्चों को कहानियां/ लोरियां सुनानी होती। लड़कियां आती हैं लड़कों के साथ, कुछ काल रहकर चली जाती हैं। नई पारी, और फिर नई पारी। एक समय आता है जब लड़की दुखी होकर, बच्चों को साथ लेकर अपनी मां के पास रहने लगती है। एक उम्र के बाद तो नया घर बसाना भी आसान नहीं होता। सारे कानून भी महिलाओं/ बच्चों के पक्ष में हैं और वे ही टूटते परिवारों के मूल कारण हैं।
सुख उसी घर में बरसता है जहां सास अपनी बहू को नई पीढ़ी की सास बना देती है। सुनने में बात बड़ी रूढिवादी लगती है। सचाई भी यही है कि व्यक्ति कितना भी पढ़ा लिखा हो, कितने भी बड़े पद पर बैठा हो, धनवान हो, घर में पैर रखते ही वह रूढिवादी हो जाता है। उसका विकास पीछे खिसक जाता है। प्रकृति के नियम भौतिक विकास तथा आधुनिक विज्ञान पर आधारित नहीं हैं। अनेक जन्मों के कर्मो का फल प्रकट होता है। इसी को रूढि कह सकते हैं। इसी आधार पर एक-दूसरे के साथ प्रकृति व्यवहार करती है। जहां भी व्यक्ति प्रकृति के स्थान पर स्वयं कत्ताü बनने का प्रयास करता है, वहीं उसके मार पड़ जाती है। उसके आगे सब जीव हैं। जैसा करो, वैसा भरो।
8.4.11
पृथिवी
कविताए
ंटिका रखती है
पृथिवी हमें
और कंपाती भी,
बरसता गगन से
जल और अग्नि,
पवन देता ठिठुरन
और चक्रवात
वही लेकर चलता
ऎश्वर्य सौरभ,
समाहित सभी कुछ
बस एक नभ में
अनासक्त रहता जो
फिर भी सभी से,
बंशी की धुन में
मगन कृष्ण जैसे!
तुम नहीं हो
यहां आद्या
इन दिनों
फिर भी
आती रहती हैं
आवाजें तुम्हारी
मानो उठ रहीं
भीतर आकाश से,
चरण रहते हैं
जहां तुम्हारे
बसता है स्वरूप
मस्त-मौला सा,
लगता है फिर
यहीं हो तुम
हां, आद्या।
पकड़ने लगी हो
शब्दों को हर बार
आद्या!
याद रखना
शरीर है शब्द भी
खो मत जाना
भाष्ाा में, शब्दों में,
पीछे अक्षर है,
ध्वनि और नाद है
जिन पर टिकी है
हर भाष्ाा,
उन्हीं पर टिका है
शरीर हमारा भी।
कठिन है
अच्छा रहना
जीवन में,
निभा लेना भी
सदाचार का,
अर्जुन की तरह
शापित होना
उर्वशी से,
कलयुग में
चारों ओर घिरा
अंधकार, व्यभिचार,
भूले से मिलता
कोई मीठा-भला
और देना पड़ता
उसको भी शाप।
आद्या,
कई रश्मियां
घेरेंगी तुमको
डुबोकर रोशनी में
भांति-भांति की,
और अपेक्षा करेंगी
तुम फैलाओ
उनके प्रकाश को,
यानि मत करो
प्रकट अपने
आत्म-प्रकाश को।
सूर्य का प्रकाश
कैसा लगता है
प्रकाशित होकर
चन्द्रमा से।
मन्द मन्द वायु
फैलाती है
सुगंध
चारों दिशाओं में,
और
क्रोध आते ही
फैंकने लगती हैं
धूल, कांटे
पत्थर-कंकर
राहगीरों पर।
गति हो तुम
ऋ çष्ा हो तुम
यजु हो तुम
आद्या!
कैसे हो जाती
गतिमान अचानक
बिजली की ट्रेन सी,
और ठहर जाती
स्थिति बनकर,
रोककर गति
न केन्द्र है
न ही परिघि
गति है अमूर्त में
ऋ त् में,
ऋ çष्ा हो तुम
आद्या।
छोटा सा जीवन
पानी सा तरल
हवा सा विरल
और कभी चीखता
आंधी की तरह,
उतर जाता कभी
भाटा बनकर,
कैसा संसार तुम्हारा
कैसे संगी-साथी
एक क्षण मानो
दिया बाती
और अगले ही क्षण
निर्मोही बनकर
फैंक जाती।
बनने लगी हैं
कलाएं
आद्या की,
कला भी
काल भी
माया और विद्या
नियति सहित,
राग-द्वेष्ा
अभि निवेश
ईष्र्या
बाल स्वरूप में
लगते हैं
श्ृंगार जैसे
जीवन के।
महाभारत
होता है जीवन
हर किसी का
भीतर भी,
बाहर भी
बैठे हैं न
कृष्ण
सबके भीतर,
कह रहे गीता
सबको अपनी-अपनी
सुन सकते हो
इसको तुम भी
अर्जुन बनकर।
3.4.11
अपनी दुनिया अपने हक
अपनी दुनिया अपने हक
'विटनैस द नाइट' किश्वर की दूसरी किताब है। इस किताब में औरतों के साथ भेदभाव, गैर बराबरी का बर्ताव, अनचाही संतान और çस्त्रयों के प्रति पुरूष समाज के पूर्वाग्रह को शब्दों में उतारने का प्रयास किया गया है। लार्ड मेघनाद देसाई की पत्नी किश्वर ने अपने इस उपन्यास का तानाबाना हिंदुस्तान की पृष्ठभूमि में बुना है। यहां वह अपने अब तक के सफर की चर्चा करने के साथ देश और समाज के अहम मसलों पर अपनी राय जाहिर कर रही हैं।
अपनी दुनिया अपने हक
अपनी माटी से गहरा जुड़ाव
मैंने हिंदुस्तान की धरती पर ही जन्म लिया और यहीं मेरी परवरिश हुई है। लिहाजा यहां से गहरा जुड़ाव है। मेरे पिता पुलिस में थे और दूसरे लोगों की तुलना में वे थोड़े अघिक ईमानदार थे, लिहाजा उनका बार-बार तबादला होता था और इस वजह से मैंने दस अलग-अलग स्कूलों में अपनी पढ़ाई पूरी की। कॉलेज में मैंने इकॉनोमिक्स की पढ़ाई की, हालांकि जल्द ही मुझे एहसास हो गया था कि यह मेरा फील्ड नहीं है। इसी दौरान 'इंडियन एक्सप्रेस' और 'फेमिना' जैसे प्रकाशनों में मुझे काम करने का मौका मिला। मैंने यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन के लिए डॉक्यूमेंट्री बनाई और इसके बाद मैं एनडी टीवी मेंआ गई। ब्रिटेन आने से पहले तक मैं इसी चैनल के साथ थी, फिर अपनी पहली किताब 'डार्लिगजी' के सिलसिले में मैं ब्रिटेन छा गई। इस किताब को इतना अच्छा रेस्पॉन्स मिला कि लेखन को अपनाने का फैसला किया।
औरत कमजोर नहीं
अपने अब तक के कॅरियर में मुझे कहीं ऎसा नहीं लगा कि एक औरत होने के नाते मेरे सामने मुश्किलें खड़ी की जा रही हैं। बल्कि मैं तो कहना चाहूंगी कि औरत होने के बावजूद हर जगह मुझे अच्छा सहयोग मिला। मेरा मानना है कि अगर हम अपना काम पूरी ईमानदारी और मेहनत से करें तो हमें आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता। हमारी अपनी दुनिया है और हमारे अघिकारों से हमें कोई वंचित नहीं कर सकता। मैं काफी समय से ब्रिटेन में काम कर रही हूं और यहां भी मुझे कभी ऎसा नहीं लगा कि औरत होने के कारण या फिर दूसरे देश से नाता रखने के कारण मेरे साथ अलग बर्ताव किया जा रहा है। वैसे भी मेरा तो यही मानना है कि एशियाई लोगों की नई पीढ़ी किसी किस्म की नाइंसाफी बरदाश्त कर ही नहीं सकती, क्योंकि वह हर लिहाज से आगे है।
आवाज बुलंद करें
मुझे तब बेहद अफसोस होता है, जब मैं ऑनर किलिंग और जबरन शादी करा देने जैसी घटनाओं के बारे में पढ़ती हूं। हमारे देश में तो ऎसा हो ही रहा है, पर अफसोस की बात यह है कि ब्रिटेन में रहने वाले एशियाई परिवारों के बीच भी ऎसी शर्मनाक घटनाएं हो रही हैं, क्योंकि वे लोग अपनी तमाम बुराइयों के साथ यहां आ गए हैं। ब्रिटेन में ऎसे मामलों को मीडिया बहुत हवा देता है और यहां ऎसे कई संगठन हंै, जो पीडित लोगों की मदद करने के लिए तैयार रहते हंै, इसलिए यहां तो यह उम्मीद की जा सकती है कि हालात में जल्द ही सुधार होगा। लेकिन अपने देश में लोग çस्त्रयों का सम्मान करना कब सीखेंगे, यह मैं नहीं कह सकती। महिलाओं को अपने हक के लिए आवाज उठानी होगी। खास तौर पर उन्हें कोख में ही बçच्चयों को मार डालने की प्रवृत्ति के खिलाफ आवाज बुलंद करनी होगी, उन्हें जताना होगा कि वे अपनी कोख में पल रहे अपने ही अंश को बचाए रखने के लिए कुछ भी कर गुजरने के लिए तैयार हैं।
बोझ संस्कारों और रस्मों का
विदेश में रहकर भी अपनी भूमि और भाषा के प्रति गहरा लगाव रखने वाली स्वप्नमंजूषा 'अदा' ब्लॉगर होने के साथ-साथ कवयित्री भी हैं। रांची में रहकर बड़ी हुई और फिलहाल ओटावा (कनाडा) में रह रहीं 'अदा' की कविताओं और ब्लॉग पोस्टों में नारीत्व के प्रति गौरव का भाव तो है ही, मातृभूमि और अपनों से दूर रहने की व्यथा भी झलकती है। नारी की दुनिया जिस तरह सीमाओं और संस्कारों के दायरे में समेट दी गई है, उसके प्रति मासूम-सा विद्रोह भी दिखाती हैं, स्वप्न मंजूषा की कविताएं-
इंसान के कंधों पे, रिवाजों का बोझ है/ पाजेब है संस्कार की, रस्मों का बोझ है/ आंखें वो हवस से भरी, हैं खार चुभोतीं / हैं फूल से बदन, उन निगाहों का बोझ है।
हालांकि कनाडा की जगमगाती और सुविधाजनक दुनिया में अदा को वह सब शायद ही सहन करना पड़ता हो जो आम भारतीय नारी करती है, लेकिन पारंपरिक नारी के प्रति उनके सरोकार खत्म नहीं होते। ब्लॉगिंग के बहाने अपने घरेलू जीवन में उपलब्ध उन्मुक्तता का जिक्र करते हुए वे अपनी देसज भाषा में लिखती हैं- ब्लॉगिंग से हमको का तकलीफ होगी भला ...तकलीफ तो बाकी लोगों को होती है... सब बोलते हैं कि जब देखो तब इसी में लगी रहती है... हम सुनकर भी कान में तेल दिए रहते हैं और मजे से करते हैं ब्लागिंग...।
जाहिर है, कनाडा में बसी प्रवासी भारतीय नारी और रसोईघर के कामकाज और दूसरों की सेवा में अपना ज्यादातर जीवन गुजार देने वाली विशुद्ध भारतीय गृहिणी के जीवन की सच्चाइयां अलग-अलग हैं। उनके जीवन-संघर्ष भी अलग-अलग हैं। लेकिन लंबे समय तक पारंपरिक çस्त्रयों के संसार से रूबरू होती रहीं अदा परिवार, पति और समाज की अपेक्षाओं पर खरा उतरने की पारंपरिक जद्दोजहद में लगी महिलाओं के अनुभवों से अनजान नहीं हैं। यह उदाहरण देखिए जिसमें वे द्रोपदी के बहाने आम स्त्री की पीड़ाओं और विवशताओं पर टिप्पणी करती हैं।
भावुक होकर भी वे अपने असंतोष को छिपाती नहीं। असंतोष, जो सिर्फ समाज या पुरूषों के रवैए के प्रति ही नहीं है बल्कि स्त्री की समर्पणकारी मन:स्थिति के विरूद्ध भी है-चौपड़ की गोटी बनी, रिक्त सा जीवन पाया / बिन सोचे-समझे पांडवों ने तुझ पर दांव लगाया/ अब बनो वस्तु से नारी और करो मनन / पांचाली तुम्हें किस रूप में करूं मैं स्मरण ?
आज शोषण, दुख, अन्याय, विश्वासघात, असमानता, भेदभाव आदि को उनकी लेखनी अस्वीकार्य मानती है- प्रभु तुम्हारी दुनिया में, इतना अन्याय क्यों होता है ?/ जीत-हार के अंतराल में, निर्दोष बलि क्यों चढ़ता है?
स्वप्न मंजूषा खालिस मध्यवर्गीय प्रवासी भारतीयों जैसी हैं जिन्हें वह हर चीज अच्छी लगती है जिसमें अपनी संस्कृति, अपने देश के साथ नोस्टेल्जिया का एहसास हो- पुरानी फिल्में, पुराने गाने, जगजीत सिंह, मेहंदी हसन की गजलें और लोपामुद्रा से लेकर पंचतंत्र और चाचा चौधरी जैसी पुस्तकें। ब्लॉगिंग भी एक कड़ी है जो उन्हें अपनी इस बिछुड़ी दुनिया से जोड़ती है और इसीलिए वे इसका जिक्र करते हुए जैसे किसी और कोमल-सी दुनिया में चली जाती हैं-
(अपनी ब्लॉग पोस्टों पर भारत से आने वाली टिप्पणियों को) देखते ही मैं भारत की अलसुबह के दर्शन करती थी....बिल्कुल वही एहसास होता था जैसे सुबह कि किरणें फूट रहीं हैं ..चिडियों की चहचहाहट...मंदिर की घंटी, मस्जिद की अजान... जैसे एक सुंदर सी गोरी इधर से उधर छमछम करती हुई आ-जा रही है...।।
भारतीय नारी की प्राथमिकताओं में परिवार बहुत दूर कैसे रह सकता है? लगाव उनकी रचनाओं में खूब दिखता है- कहीं बच्चों का जिक्र आने पर सहज उमड़ आने वाली प्रसन्नता के रूप में, तो कहीं माता-पिता का जिक्र आने पर उपजने वाले गौरव के जरिए। वे लिखती हैं- मेरे 3 बच्चे हैं। मेरी दुनिया उनसे शुरू और उन्हीं पर खत्म हो जाती है... इसी तरह एक जगह उन्होंने लिखा है कि मुझे समय निकालकर अपने माता-पिता को अच्छी जगहों पर घुमाने ले जाना बहुत पसंद है।
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