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11.9.11

संस्कृति खतरे में है……कोई तो बचाने आओ

आज हमारी इस ब्लाग पर यह पहली पोस्ट है। चूँकि सच बोलना मना है (शायद इस कारण कि कड़वा होता है या फिर इस कारण कि इसे सुनना कोई पसंद नहीं करता) चलिए कुछ लिखने के पहले शपथ कि जो कहेंगे सच कहेंगे (पता नहीं कितना) सच के सिवाय भी बहुत कुछ कहेंगे।
सवाल यह कि क्या सच है और क्या नहीं? आज देश में उबाल आ गया है (जैसा बासी कढ़ी में आता है) अदालत के धारा 377 के ऊपर अपना निर्णय देने के बाद से। संस्कृति क्षरण का मामला दिख रहा है; देश की सभ्यता संकट में आती दिख रही है।
इस अदालती फैसले का बुरा तो हमें भी लगा क्यों लगा यह समझ नहीं आया? समलैंगिकों को देश की मुख्यधारा में जोड़ने का कोई एक यही तरीका नहीं था कि इसे कानूनी मदद दे दी जाये। ये तो वैसा ही हो गया जैसे कि डकैतों, चोरों, बलात्कारियों को देश की मुख्यधारा में लाने के लिए कानूनी सेरक्षण दे दिया जाये।
सहमति से बालिग स्त्री-स्त्री का और पुरुष-पुरुष का सम्बन्ध बनता है तो वह कानूनी अपराध नहीं है। बिना हत्या किये यदि डकैती डाल दी जाती है तो वह डकैती नहीं। बलात्कार किया जाये और महिला को शारीरिक चोट न पहुँचे या फिर वह गर्भवती न हो तो बलात्कार अपराध नहीं। समझ गये आप क्या कहना चाह रहे हैं हम?
जहाँ तक संस्कृति की बात है तो देश की संस्कृति को लोगों ने इतना सहज बना दिया है कि हर कोई उसकी व्याख्या करने लगता है। समलैंगिकता के समर्थकों ने तो कह दिया कि वेद-पुराण में भी ऐसे सम्बन्धों के बारे में चर्चा है। यहाँ गौर किया जाये कि समलैंगिकता का समर्थन करने वाली तादाद युवा वर्ग की है, लगभग शत-प्रतिशत। हास्यास्पद तो यह है कि जिस पीढ़ी को अपने माँ-बाप का, अपने परिवार की संस्कृति का पता नहीं वह हमारे वेद-पुराणों को पढ़ का उसका व्याख्यान दे रही है। जिस पीढ़ी को सहज सेक्स के बारे में ज्ञात नहीं वह वेद-पुराणों में सेक्स सम्बन्धों का चित्र प्रस्तुत कर रही है।
समलैंगिकता के सम्बन्धों का वेद-पुराणों में हवाला देने वाले बतायें कि कौन से वेद में इस तरह का वर्णन है? खजुराहो और कामसूत्र का जो लोग उदाहरण प्रस्तुत करते हैं वे यह बात अच्छी तरह जान लें कि इन साहित्यों की रचना इसी तरह के भ्रष्ट कामियों को राह दिखाने के लिए की गई थी।
अब कुछ संस्कृति के कथित रक्षकों के लिए भी। वह यह कि जो लोग भगवान राम को काल्पनिक मानते हैं वे शंबूक वध का सहारा लेकर समूची हिन्दू जाति, भगवान राम और सवर्ण जाति को गाली देते घूमते हैं। कृपया बताया जाये कि यदि उनकी दृष्टि में भगवान राम काल्पनिक हैं तो शंबूक वध कहाँ से वास्तविक है?
इसी तरह माता सीता का नाम लेकर समूचे पुरुष समाज को कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है। स्त्री के ऊपर अत्याचार का वर्णन किया जाता है। कितनी-कितनी बार अग्निपरीक्षा देने की दुहाई दी जाती है। ऐसा करने वालीं स्त्रियाँ, महिला सशक्तिकरण की समर्थक महिलायें उसी परिवार की एक महिला उर्मिला के त्याग को भूल जातीं हैं। सीता जी का नाम लेकर स्वयं को पुरुष वर्ग से टकराने तक की ताकत दिखाने वालीं महिलायें क्या उसी उर्मिला का नाम लेकर अपनी सास या ससुर की सेवा कर सकतीं हैं? बिना पति के घर-परिवार को चला सकतीं हैं? आज आलम यह है कि घर में आते ही एकल परिवार की अवधारणा को पुष्ट करने लगतीं हैं।
संस्कृति के नाम पर क्या हो रहा है, क्या होना चाहिए यह किसी को सही से ज्ञात नहीं। समलैंगिकता के नाम पर हो रहे हो-हल्ले से कुछ और हो या न हो उन लोगों के हौंसले अवश्य बढ़ेंगे जो प्राकृतिक सेक्स में असफल इसी तरह के अप्राकृतिक यौन सम्बन्धों की आस में लगे रहते हैं।

11.3.11

सेक्स का जिक्र आते ही क्षणभर में


सेक्स को हमारे यहां हमेशा से ही टैबू माना गया है। सेक्स पर बात करना। उसे जग-ज़ाहिर करना या आपस में शेयर करना। हर कहीं सेक्स प्रतिबंधित है। सेक्स का जिक्र आते ही क्षणभर में हमारी सभ्यता-संस्कृति ख़तरे में पड़ जाती है। मुंह पर हाथ रखकर सेक्स की बात पर शर्म और गंदगी व्यक्त की जाती है। सेक्स को इस कदर घृणा की दृष्टि से देखा जाता है, मानो वो दुनिया की सबसे तुच्छ चीज हो।
खुलकर सेक्स का विरोध करते हुए मैंने उन सभ्यता-संस्कृति रक्षकों को भी देखा है जिन्हें सड़क चलती हर लड़की में (गज़ब का माल) दिखाई देता है। जिन्हें देखकर उनके हाथ और दिमाग न जाने कहां-कहां स्वत: ही विचरण करने लगते हैं। जिन्हें रात के अंधेरे में नीली-फिल्में देखने में कतई शर्म नहीं आती और नीली-फिल्मों के साथ रंगीन-माल भी हर वक्त जिनकी प्राथमिकता में बना रहता है। परंतु रात से सुबह होते-होते उनका सेक्स-मोह (सेक्स-टैब) में बदल जाता है।
हमारे पुराणों तक में लिखा है कि यौन-सुख स्त्री के लिए वर्जित, पुरुष के लिए हर वक्त खुला है। पुरुष आजाद है हर कहीं (मुंह मारने) के लिए। यही कारण है स्त्री को अपना सेक्स चुनने की आजादी हमारे यहां नहीं है।
यह सही है कि हम परिवर्तन के दौर से गुजऱ रहे हैं। हर दिन, हर पल हमारे आस-पास कुछ न कुछ बदल रहा है। हम आधुनिक हो रहे हैं। यहां तक कि टीवी पर दिखाए जाने वाले कंडोम, केयरफ्री, ब्रा-पेंटी के विज्ञापनों को भी हम खुलकर देख रहे हैं। एक -दूसरे को बता भी रहे हैं। मगर सेक्स को स्वीकारने और इस पर अधिकार जताने को अभी-भी हमने अपनी सभ्यता-संस्कृति के ताबूतों में कैद कर रखा है। हमें हर पल डर सताता रहता है कि सेक्स का प्रेत अगर कहीं बाहर आ गया तो हमारी तमाम पौराणिक मान्यताएं-स्थापनाएं पलभर में ध्वस्त हो जाएंगीं। हम पश्चिमी भोगवाद के शिकार हो जाएंगें। इसलिए जितना हो सके कोशिश ·रो अपनी मां-बहनों, पत्नियों को सेक्स से दूर रखने और उन्हें अपनी इच्छाओं से अपाहिज बनाने की।
हमारे पुराणों तक में लिखा है कि यौन-सुख स्त्री के लिए वर्जित, पुरुष के लिए हर वक्त खुला है। पुरुष आजाद है हर कहीं के लिए। यही कारण है स्त्री को अपना सेक्स चुनने की आजादी हमारे यहां नहीं है।
गज़ब की बात यह है स्त्री-सेक्स पर प्राय: वे लोग भी अपना मुंह सींये रहते हैं जो स्त्री-विमर्श के बहाने (स्त्री-देह) के सबसे बड़े समर्थक बने फिरते हैं। स्त्री जब अपने सुख के लिए सेक्स की मांग करने लगती है तो परंपरावादियों की तरह उनके तन-बदन में भी आग-सी लग जाती है। इन स्त्री-विमर्शवादियों को सेक्स के मामले में वही दबी-सिमटी स्त्री ही चाहिए जो मांग या प्रतिकार न कर सके।
पता नहीं लोग यह कैसे मान बैठे हैं कि हम और हमारा समाज निरंतर बदल या विकसित हो रहा है। आज भी जब मैं किसी स्त्री को दहेज या यौन शोषण के मामलों में मरते हुए देखती हूं तो मुझे लगता है हम अभी भी सदियों पुरानी दुनिया में जी रहे हैं।
मुझे एक बात का जवाब आप सभी से चाहिए आखिर जब पुरुष अपने बल पर अंदरूनी और बाहरी सारे सुख भोगने को स्वतंत्र है तो यह आजादी स्त्रियों को क्यों और किसलिए नहीं दी जाती? क्या इच्छाएं सिर्फ पुरुषों की ही गुलाम होती हैं, स्त्रियों की नहीं?

क्या इन टोटको से भर्ष्टाचार खत्म हो सकता है ? आप देखिए कि अन्ना कैसे-कैसे बयान दे रहे हैं? शरद पवार भ्रष्ट हैं। भ्रष्टाचार पर बनी जीओएम (मंत्रिसमूह) में फला-फलां और फलां मंत्री हैं। इसलिए इस समिति का कोई भविष्य नहीं है। पवार को तो मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे देना चाहिए। पवार का बचाव करने की कोई जरूरत नहीं है। अगर पवार के मंत्रिमंडल से बाहर हो जाने से भ्रष्टाचार